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लेखक= रोहतास उर्फ अजय दीक्षित उपसंपादक
नाम छपना तो बहाना था, असली खेल तो “हम सरकारी हैं” वाला स्टीकर छिन जाने का है।
वो रिपोर्टर जो डायरेक्टरी दिखा कर थाने में एंट्री मारते थे – “देखो, हमारा नाम छपा है ऊपर से” – अब वो क्या दिखाएंगे? आधार कार्ड?
इस बार पुलिस विभाग की हर साल छपने वाली डायरेक्टरी में ऐसा “सुधार” हुआ कि चौथा स्तंभ ही गायब कर दिया गया!
दशकों से इस डायरेक्टरी में प्रमुख अख़बारों और न्यूज़ चैनलों के क्राइम रिपोर्टरों के नाम और मोबाइल नंबर शामिल होते थे, मगर इस बार पत्रकारिता का पूरा कुनबा बाहर—अंदर केवल दूरदर्शन और सूचना विभाग!
सबसे बड़ा संकट उन पत्रकारों पर आया है जो वर्षों से अफसरों की परिक्रमा को ही पत्रकारिता समझ बैठे थे…
डायरेक्टरी से नाम क्या गायब हुआ, मानो सरकारी मान्यता ही छिन गई हो!
सूत्र बताते हैं—
“चमचागिरी जगत” में मातम पसरा है…और कई लोग अपना नाम खोजते-खोजते डायरेक्टरी दो तीन बार पल चुके हैं