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उधार लिए नैरेटिव्स, संस्थागत हेर-फेर और इसके अनुयायी संगठनों द्वारा हिंसा की अनुपस्थिति में क्या हिंदुत्व जीवित रह सकता है? सांस्कृतिक श्रेष्ठता और मुसलमानों और ईसाइयों को उनकी ही ज़मीन पर ग़ैर बताने की अवधारणा नाज़ी दर्शन से ली हुई है। जाति पदानुक्रम पर आधारित पुरातन सामाजिक संरचना के लिए इसका समर्थन आधुनिक समाज की चुनौतियों का सामना कर पाएगा? 100 वर्षों का इसका इतिहास इसकी भटकाने वाली गप्प, जैसे सबके लिए विकास और खुशहाली और सबको 15 लाख जैसे जुमलों का ही गवाह है।
मोदी ने यही जादूगरी 2014 में दिखाई थी। उन्होंने सफलतापूर्वक एक ऐसी राजनीतिक छवि अपनाई जिसने उनकी असली राजनीति को छिपा दिया। गुजरात में उनका शासन 2002 में हुए नरसंहार के लिए कुख्यात है, और 12 सालों का उनका राज, उस राज्य को देश के तीसरे सबसे भूखे राज्यों में ले जा पहुँचा जहाँ सामाजिक आर्थिक अंतर का अनुपात बहुत अधिक हो गया।
1947 में विभाजन की बेचैनी से गुज़र रही हिंदू आबादी का संघ ने फायदा उठाया था। और 2014 में मनमोहन सरकार के शासन में बाहर आ रहे भ्रष्टाचार के मामलों से उपजी बेचैनी का। पूरे आत्मविश्वास के साथ गुजरात मॉडल बेचा गया और देश की आर्थिकी को चकरा देने वाली ऊँचाइयों पर ले जाने वाले जादूगरों की तस्वीर पेश की गयी।
मोदी ने आधुनिकता और विकास का मुखौटा पहन लिया ताकि सांप्रदायिक मंशाएं लोगो की निगाह से छिपी रहे। पुनरुत्थानवादी छवि को लोगों ने हाथों हाथ लिया और वे चुनाव जीत गए, और इसके बाद गुजरात मॉडल का कभी ज़िक्र नहीं हुआ।
आदित्यनाथ द्वारा, जो एक “संन्यासी” हैं, स्मार्ट शहरों, सेमीकंडक्टर उद्योग, या उच्च तकनीकी रक्षा प्रतिष्ठानों के बारे में बात करना अजीब नहीं है? ब्राह्मणवाद के विरुद्ध खड़े नाथ सम्प्रदाय के एक साधु होने के बावजूद वे उन सभी बातों का दम भरते हैं जो ब्राह्मणवाद को पुनर्स्थापित करती हैं। इन सबकी यात्रा में एकमात्र निरंतरता अल्पसंख्यकों के प्रति उनकी नफरत में है।
इसके बगैर उनकी नैय्या पार नहीं लग सकती। लेकिन, यह विचारधारा भारतीय सभ्यता के उन सभी पहलुओं को नष्ट कर रही है जिसने प्राचीन काल से ही दुनियाभर के विभिन्न विचार संप्रदायों को पनाह दी है। दुनिया के किसी भी धर्म या विचार को भारतीय विमर्श में अपनी गैर-मौजूदगी पर अफ़सोस नहीं करना चाहिए। संघ की विचारधारा इस मेल-मिलाप के बिल्कुल उलट है। वे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) की बात तो करते हैं, लेकिन ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक भाषा’ जैसी संकीर्ण सोच अपनाकर इस अवधारणा को खत्म कर देते हैं।
उम्मीद है कि संघ, भागवत की विदेश यात्रा से सही सबक सीखेगा और इस बात को समझेगा कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना लोगों को बाँटने वाली नफरती राजनीति के दायरे में नहीं समा सकती।
लेखक रोहतास उर्फ अजय दीक्षित