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रोहिताश उर्फ अजय दीक्षित
सुनने में अच्छा लगता है ना—आत्मनिर्भर भारत!
उन्होंने कहा कि भारत आत्मनिर्भर बनेगा, तो हमने भी सोचा कि अगर केंद्र की सरकार, देश की सरकार हर मंच से आकर कह रही है और खुद को प्रभु श्रीराम का अनुयायी बताती है, तो झूठ तो नहीं बोलेंगे।
हमने सोचा कि अगर ये आत्मनिर्भर भारत बनाने की बात कर रहे हैं, तो शायद हमारे खेत आत्मनिर्भर हो जाएंगे, हमारे किसान आत्मनिर्भर हो जाएंगे, हमारे बाजार आत्मनिर्भर हो जाएंगे, हमारी फैक्ट्रियां और कारखाने आत्मनिर्भर हो जाएंगे, हमारे स्कूल और बैंक मजबूत हो जाएंगे।
उन्होंने बड़े जोर-शोर से कहा—“वोकल फॉर लोकल”, यानी स्वदेशी को बढ़ावा देंगे।
लेकिन पता नहीं ऐसा क्यों है कि आज हम जिस बाजार में जाते हैं, वहां स्वदेशी सामान के ऊपर चीनी माल हावी दिखाई देता है।
जिस फैक्ट्री में जाते हैं, चाहे ऑटो पार्ट हो या मशीनरी का सामान, वहां “मेड इन इंडिया” से ज्यादा “मेड इन चाइना” दिखाई देता है।
तो फिर सवाल है—ये कौन से आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहे थे?
हमारे बाजार आत्मनिर्भर नहीं हुए।
हमारे कारखाने आत्मनिर्भर नहीं हुए।
हमारे किसान आत्मनिर्भर नहीं हुए।
किसान की फसल आज भी छुट्टा जानवर चर जाते हैं।
हमारे बैंक भी संकटों से जूझ रहे हैं।
तो फिर आत्मनिर्भर भारत आखिर बना कौन?
बहुत सोचने के बाद समझ आया कि ये लोग नाक सीधी पकड़ते ही नहीं, हमेशा घुमाकर पकड़ते हैं।
असल में शायद ये कहना चाह रहे थे कि धर्मस्थल हमारे होंगे, धर्मस्थलों में रखे दानपात्र हमारे होंगे, उन दानपात्रों पर लगने वाला ताला हमारा होगा, उस ताले की चाबी हमारे हाथ में होगी और उसमें आने वाला चढ़ावा देश के कमेरा समाज का होगा।
और फिर उस दानपात्र को लूटने वाले भी अपने ही लोग होंगे!
शायद यही इनके आत्मनिर्भर भारत का मॉडल है।
जिस देश को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था, उस देश के खजाने, खेत-खलिहानों और मेहनतकश जनता को लूटने के लिए अब अंग्रेजों या मुगलों की जरूरत नहीं है।
क्योंकि आज लूटने वाले बाहर से नहीं, व्यवस्था के अंदर बैठे हैं—जो जनता के संसाधनों को अपने हाथ में लेकर खुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में लगे हैं।