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मैं कल एक शमशान घाट से गुजरी। वहां मुर्दों को जलाने के लिए चार प्लेटफॉर्म बने थे। हैरान करने वाली बात यह थी कि तीन प्लेटफॉर्म खाली थे और एक पर लंबी लाइन लगी थी।
मैंने वहां के इंचार्ज से पूछा, “भाई, ये तीन खाली क्यों हैं? मुर्दों को वहां क्यों नहीं जलाते?”
उसने मुझे घूर कर देखा और बोला, “लेखक महोदय, अपनी बुद्धि ज्यादा मत चलाओ। वो तीन प्लेटफॉर्म आरक्षित (Reserved) वर्ग के मुर्दों के लिए हैं। यह चौथा वाला सामान्य वर्ग (General Category) का है। जब तक जनरल वाले लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार नहीं करेंगे, तब तक देश में सामाजिक न्याय कैसे आएगा?”
मैं हैरान रह गई। इस देश में अब मरने के लिए भी ‘मेरिट’ नहीं, बल्कि सही कोटे की लाश होना जरूरी है।
एक लड़का अपनी फटी हुई चप्पल और आंखों में आंसू लिए मेरे पास आया। बोला, “मैं 99.99 प्रतिशत नंबर लाया, फिर भी सड़क पर घूम रहा हूं। और मेरे पड़ोस वाला, जो परीक्षा में सिर्फ अपना नाम ठीक से लिखना नही जानता है, मैंने अपनी आंखों से देखा कि एक मुजरिम को कोर्ट में पेश करने से पहले उसके घर वालों को सूचना दी जाती है कोर्ट में पेश होने वाली कागज पर नाम और मोबाइल नंबर अंकित किया जाता है जब एक सरकारी वकील ने उसे बताया तब मोबाइल नंबर और नाम दर्ज किया और वह बड़ी कुर्सी पर बैठा है। ऐसा क्यों?”
मैंने उसका कंधा दबाया और कहा, “मूर्ख! तूने स्कूल में सिर्फ किताबें रटीं। काश तूने अपने दादा-परदादा के पुराने संदूक में कोई चमत्कारी ‘जाति प्रमाण पत्र’ ढूंढा होता। इस देश में 99 प्रतिशत दिमाग की कीमत उतनी भी नहीं है, जितनी एक तहसील से बने सौ रुपये के जाति वाले कागज की है। अपनी खोपड़ी का वजन मत नाप, अपनी जाति का वजन नाप!”
चुनाव का सीजन आते ही सारे नेता अचानक समाजशास्त्री बन जाते हैं। वे देश का नक्शा नहीं देखते, वे जातियों का कबाड़खाना खंगालते हैं। एक बड़ी रैली में नेता जी दहाड़ रहे थे, “भाइयों और बहनों! अगर हम सत्ता में आए, तो आरक्षण की सीमा ५० से बढ़ाकर ९० प्रतिशत कर देंगे!”
मैंने मंच के पीछे जाकर नेता जी का कुर्ता खींचा और फुसफुसाया, “साहब, बाकी के १० प्रतिशत में देश का क्या होगा?”
नेता जी हंसे और बोले, “वो 10 प्रतिशत उन बेवकूफों के लिए छोड़ दिया है, जो रात-दिन पढ़ाई करके टैक्स भरेंगे। अगर वो टैक्स नहीं भरेंगे, तो हमारी सरकारी तिजोरी कैसे भरेगी? और तिजोरी नहीं भरेगी, तो हम मुफ्त की रेवड़ियां और वजीफे कैसे बांटेंगे? हमें देश थोड़े ही चलाना है, हमें तो बस अगली सरकार बनानी है।”
सिद्धांतों की पोथियां कहती हैं कि यह व्यवस्था उनके लिए है जो पिछड़े हैं।
और मलाईदार परत वालों को आरक्षण नहीं मिलेगा। लेकिन व्यावहारिक सच यह है कि मलाई चाहे जितनी गाढ़ी हो, बिल्ली उसे छोड़ने को तैयार नहीं है।
लेकिन मैंने अपनी आंखों से देखा है कि मलाईदार परत (Creamy Layer) के गिद्ध इतने भूखे हैं कि वे असली शोषितों के हिस्से का दाना भी निगल जाते हैं। एक आईएएस अफसर, जिसके घर में सोने के चम्मच से खाना खाया जाता है, अपने नालायक बेटे के लिए ‘पिछड़ेपन’ का रोना रो रहा था ताकि उसे बिना पढ़े ही कोई बड़ी कुर्सी मिल जाए।
जब मैंने टोका, तो वह झल्लाकर बोला, “मैं चाहे जितना अमीर हो जाऊं, मेरी जाति का दर्द तो सदियों पुराना है ना! उस दर्द की कीमत मेरा बेटा सरकारी नौकरी पाकर ही चुकाएगा।”
सच तो यह है कि अब इस देश की तरक्की वेंटिलेटर पर है। योग्यता देश छोड़कर विदेश भाग रही है, क्योंकि उसे पता है कि यहां टैलेंट की कोई कद्र नहीं है। जो चतुर हैं, वे जाति के नाम पर समाज को बांटकर मलाई का भगौना चाट रहे हैं।
हम एक ऐसा समाज बना रहे हैं जहां क्रेन चलाने वाले को पायलट बना दिया जाता है और पायलट से कहा जाता है कि तुम सड़क पर झाड़ू लगाओ, क्योंकि तुम्हारी जाति का कोटा यही है। देश आगे बढ़े या गर्त में जाए, नेताओं की कुर्सी सुरक्षित रहनी चाहिए।
लेखक = अपने अधिकार जानिए समाचार पत्र
श्रीमती मुन्नी देवी दीक्षित प्रधान संपादक
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