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क्या वास्तविकता जाने बिना दंड देना उचित है? महाभारत से आज तक का सवाल
अपने अधिकार जानिए – विशेष संपादकीय | अलीगढ़*
एक तरफ महाभारत के ऋषि मांडव्य हैं। दूसरी तरफ आज के भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी। युग अलग हैं, परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन एक सवाल आज भी उतना ही गहरा है – *”क्या किसी व्यक्ति की वास्तविकता जाने बिना उसे दंड देना उचित है?”*
आइए, महाभारत की उस घटना को याद करें जिसने न्याय, मौन और तप के अर्थ को बदल दिया।
*कौन थे ऋषि मांडव्य?*
जिन्हें “अणिमांडव्य” भी कहा जाता है, वे महर्षि मातंग और दित्तामंगलिका के पुत्र थे। बाल्यावस्था में ही उन्होंने अनेक सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थीं। समस्त ऋषियों में सम्मानित थे। उन्होंने एक कठोर प्रण लिया था – संध्याकालीन तप के समय वे मौन व्रत धारण करेंगे। कोई शब्द नहीं, कोई उत्तर नहीं।
एक दिन हस्तिनापुर के राजकोष से लुटेरे सोना-चाँदी लूटकर भागे। पीछा करते सैनिकों से बचने के लिए लुटेरे ऋषि मांडव्य के आश्रम में घुस गए और चोरी का माल वहीं छिपा दिया।
सैनिक आश्रम पहुँचे और पूछा – “लुटेरे कहाँ हैं?”
ऋषि मौन थे। अपना व्रत तोड़ने को तैयार नहीं।
सैनिकों ने समझा – यह ऋषि भी लुटेरों का साथी है। बाँधकर राजा के सामने पेश किया गया।राजा ने पूछा – “क्या तुमने यह अपराध किया?” फिर भी मौन।राजा ने उस मौन को सहमति मान लिया। आदेश दिया – लुटेरों के साथ ऋषि मांडव्य को भी सूली पर चढ़ा दो।
सूली पर चढ़ाए गए। लुटेरों की मृत्यु हो गई। पर ऋषि मांडव्य सूली के अग्रभाग (अणि) पर भी अपने तप-बल से कई दिनों तक बिना अन्न-जल के जीवित रहे।
जब बात फैली, लोग देखने आए। साधु-संतों ने पहचान लिया – “ये तो ऋषि मांडव्य हैं!”राजा को अपनी भारी भूल का एहसास हुआ। वह नंगे पाँव दौड़ता हुआ आया, क्षमा माँगी। और ऋषि मांडव्य ने क्षमा कर दी। क्योंकि वे जानते थे, राजा ने परिस्थिति के अनुसार निर्णय लिया था। उसकी नीयत गलत नहीं थी, केवल जानकारी अधूरी थी।*अब आज के संदर्भ में सोचिए।*
यदि इस कथा में ऋषि मांडव्य हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, और वे सैनिक तथा राजा हमारे देश की वह जनता है जो देश से प्यार तो करती है, लेकिन वास्तविक स्थिति नहीं जानती…
तो क्या हम भी जल्दबाजी में निर्दोष को दंड देने की भूल कर रहे हैं?जबकि देश के करोड़ों लोगों का अनुभव है कि नरेंद्र मोदी जी ने भारत की तरक्की के लिए अथक परिश्रम किया है, दिन-रात तप किया है।
सोचिए – अगर यहाँ भी वास्तविकता जाने बिना दंड दे दिया जाए, और फिर जनता-रूपी राजा को अपनी गलती का एहसास ही न हो… तो इस देश को कितना बड़ा मूल्य चुकाना पड़ेगा?
इसीलिए आज भी कुछ लोग साधु की तरह आपको वास्तविकता से परिचित करवा रहे हैं।
कृपया… निर्णय से पहले जानिए। मौन का अर्थ समझिए। फिर न्याय कीजिए।
मुन्नी देवी दीक्षित प्रधान संपादक
अपने अधिकार जानिए समाचारपत्र , गोपी ,अकराबाद अलीगढ ?