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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक बहस चल रही है – एक ही तरह की पृष्ठभूमि वाले नेताओं को अलग-अलग नामों से क्यों पुकारा जाता है?
उत्तर प्रदेश और बिहार के चार चर्चित नामों को लेकर ये बहस है – मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, रघुराज प्रताप सिंह और अनंत सिंह।
तथ्य ये है कि चारों ही लंबे समय तक विधायक/सांसद रहे हैं और चारों पर गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज रहे हैं। मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद अब इस दुनिया में नहीं हैं, कोर्ट ने उन्हें कई मामलों में सजा सुनाई थी। वहीं रघुराज प्रताप सिंह और अनंत सिंह पर भी हथियार बरामदगी और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोपों में मुकदमे चले हैं, कुछ में बरी हुए हैं, कुछ में सजा हुई है।
अनंत सिंह के घर से हथियारों का जखीरा बरामद होने की खबरें और सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें इस बहस को फिर हवा दे रही हैं।
*हमारे संविधान का मूल मंत्र है – कानून के समक्ष सभी समान हैं।* भारतीय न्यायपालिका व्यक्ति नहीं, अपराध देखती है। किसी को “मसीहा” कहना या “माफिया” कहना मीडिया या जनता की भाषा हो सकती है, लेकिन कोर्ट के कागज में वो सिर्फ “आरोपी” या “दोषी” होता है।
एटा, अलीगढ़ और पूरे उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के लिए सीख यही है कि हम नेता को उसके काम, उसके खिलाफ चल रहे मुकदमों के कोर्ट के फैसले और संविधान के प्रति उसकी निष्ठा से आंकें, न कि नारे या उपाधि से।
क्योंकि जैसा आपके संपादकीय में लिखा है – *”असली पहचान नारों से नहीं, समय की कसौटी पर किए गए कर्मों से बनती है।”*
*– संपादकीय , अपने अधिकार जानिये
मुन्नी देवी दीक्षित # प्रधान संपादक :गांव = बिछोरागंग अलीगंज= एटा