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परशुराम ने कर्ण को कैसे पहचाना था? क्यों कहा था कि, “तू ब्राह्मण नहीं हो सकता है! सच बता कि तू कौन है?”

क्योंकि उन्हीं की ही नींद टूटने से बचाने के लिए, कर्ण अपनी बाजुओं में खूनम खून करके घुसते कीट का दर्द देर तक सहता रहा था। तभी परशुराम बोले थे कि एक ब्राह्मण में इतना धैर्य नहीं हो सकता है, कि अन्याय देख कर भी सहता रह जाए!

क्षुद्र लोग यह भी कह सकते हैं कि ब्राह्मण होकर भी परशुराम ऐसी बात कैसे कह सकते हैं ब्राह्मण जाति के विरुद्ध! लेकिन समझदार लोग जानते हैं कि उन्होंने समाज की एक “औसत सच्चाई” कही थी।

जब भी कभी कोई अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण आता है कि भारत के लोग “औसत प्रसन्नता सूचकांक” में पोर्किस्तान से भी नीचे हैं, तो आपकी अधोजटाएं सुलग जाती हैं! जब भी कभी कोई यह कह देता है, कि भारत के लोगों का “औसत आइक्यू” बहुत नीचे है, तो भी हमें मिर्गी के दौरे पड़ जाते हैं कि ऐसे कैसे कोई बोल सकता है।

लेकिन समझदार लोग जानते हैं कि औसत शब्द का अर्थ क्या होता है! वे पॉपकॉर्न की भांति उछलने नहीं लगते हैं!

अभी कुछ ही साल भी नहीं बीते हैं, कि असंभव जैसा दुरूह कार्य सम्पन्न करते हुए मोदी और शाह को, दुनिया ने देखा है। यह एक ऐसा कार्य था, जिसमें बरसों की मेहनत, असीम धैर्य और दोधारी तलवार पर चलने जैसी सतर्कता, ये सब चाहिए था। लेकिन हमारे लोग कभी इस मुद्दे कभी उस मुद्दे को लपक कर… निर्लज्जता और विक्षिप्तता की हद तक जाकर, मोदी को तेली तेली तक बोल कर सरापने लगते हैं।

श्रीराम मंदिर बनना भी ऐसा ही एक कार्य था… तथापि हमारे लोग उसी मंदिर के अयोध्या जैसी जगह से मोदी को हरवा देते हैं। और उसके बाद उछलते हुए कहते फिरते हैं कि मोदी जातिवाद फैला रहा है।

अभी कुछ ही महिने भी नहीं बीते हैं, बंगाल में असंभव ऐतिहासिक विजय के, लेकिन वही हमारे शीघ्रपतनी लोग, अब पुनः मोदी को कोसने लगे हैं, सलाह देने लगे हैं कि मुख्यमंत्री किसको बनाओ!

ये मोदी का ही धैर्य है कि वो तुम सब झींगुरों को भी साध कर, असीम पीड़ा सहते हुए भी देशहित का कार्य करता जा रहा है। मुझे गर्व है कि मोदी जी जैसे निस्वार्थी महामानव को, मैं अपने युग में साक्षात् देख रहा हूं।

वरना तुम जैसे लोग तो किसी के भी सगे नहीं हुए आज तक! न अपने परिवार के, न जाति के, न समाज के, न धर्म के, न ही देश के! इतिहास की तारीखें गवाह हैं हमारी स्वार्थपरता के, वरना इन ब्रेनलेस ज़ोम्बियों की इतनी क्षमता कभी भी नहीं थी, कि वे हमपर एक दिन भी शासन कर पाते, जबकि व्यक्तिगत वीरता, बुद्धि, धैर्य आदि की कभी कमी नहीं रही है इस पावन धरा पर! अपने

अधिकार जरिए समाचार पत्र

श्रीमती मुन्नी देवी दीक्षित प्रधान संपादक

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