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इतिहास के पन्ने फाड़ के देख लो। हम इंसानों की एक बहुत पुरानी और अजीब आदत है—जब भी कोई सत्ता में आता है, हम तुरंत उसे ‘अमर’ मान लेते हैं। लेकिन यहां मर्यादापूरसोतम राम के युग का भी अंत हुआ था।
भारत में अंग्रेज नामक दीमक आए तब वो यही सोच कर आए कि हमारा सूर्य कभी अस्त नहीं होता। वो फिजिक्स का बेसिक रूल भूल गए जो उसने हमारे एक आधे नंगे फकीर ने समझाया। फिर भी उसने 200 साल तक लगान ले कर चाय की चुस्की ली। गोरे लोग आखिर गए। भले गोरों ने हमारी जेबें खाली कर दी जो आज तक सीली नहीं है लेकिन एक बेशकीमती चीज की समझ देके गए, डेमोक्रेसी।
अब आया हैं मोदी – योगी युग। BJP के सबसे कद्दावर और लोकप्रिय नेता श्री अटल बिहारी बाजपेयी की एक फेमस बात यहाँ याद आती हैं कि,
“सरकारें आएंगी जाएंगी पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए”
राजनीति का सीधा-सा नियम है—यहाँ का किसीको अमरत्व नहीं है। जब तक सब चंगा सी, आप खुर्सी पर हो। वरना सब जंतर मंतर है। जब तक भारत का संविधान अमर है तब तक पब्लिक ही राजा है।
मोदीजी 2024 में 400 पार जाने की उम्मीद कर रहे थे लेकिन छोटा मोटा गठबंधन करना पड़ा। यहां कोई अजेय नहीं है।
वैसे भी, अफ्रीका से निकले तब से इंसानी फ़ितरत बड़ी बेरहम है। आज जो कुर्सी पर बैठकर शेर बने घूमते हैं, कल वही इतिहास की किताबों के एकाध पन्ने बन जाते हैं जिन्हें बच्चे सिर्फ़ एग्ज़ाम के डर से रटते हैं। अंग्रेज़ चले गए, मुग़ल चले गए, और हाँ… एक दिन मोदीयुग भी चला जाएगा । कोई ओर आयेगा जो ये कारवां चलाएगा।
तो क्या इस ‘युग’ का अंत आ रहा है?
अरे भाई, अंत तो हर चीज़ का तय है। गीता दर्शन का एक संक्षिप्त स्वरूप है कि,
लेखक= रोहतास उर्फ अजय दीक्षित