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सवाल पूछने वाले लोग मोदी के निशाने पर ,दीपांकर भट्टाचार्य

 श्रीमती = मुन्नी देवी दीक्षित, प्रधान संपादक   प्रधानमंत्री की “दिमाग़ी नक्सल” टिप्पणी के निशाने पर सिर्फ़ राजनीतिक विरोधी लोग नहीं हैं, बल्कि देश के वे तमाम लोग हैं जो सवाल पूछते हैं,  भाकपा माले महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का कहना है कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं और सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं।

भट्टाचार्य पटना में मंगलवार 18 अगस्त को एक संवाददाता सम्मेलन में बोल रहे थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि पहले ‘अर्बन नक्सल’, ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और ‘एंटी-नेशनल’ जैसे जुमलों के जरिए लोगों को बदनाम करने की कोशिश की गई। अब प्रधानमंत्री ने ‘दिमागी नक्सल’ जैसा नया शब्द गढ़ दिया है।

भट्टाचार्य ने कहा कि जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि यूपीए सरकार के समय नीति-निर्माण में माओवादी सोच के लोग शामिल थे, तो क्या मनरेगा और जनता के पक्ष में बनाए गए दूसरे कानून भी उनकी नजर में उसी सोच का परिणाम हैं?

उन्होंने कहा कि मनरेगा जैसे कानूनों ने ग्रामीण गरीबों और मजदूरों को अधिकार देने का काम किया है। जनता के अधिकारों और कल्याण के लिए बनी नीतियों को ‘माओवादी सोच’ से जोड़ना लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की अवधारणा को ही कटघरे में खड़ा करना है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की राजनीति का संदेश यह है कि लोग अपने दिमाग से सवाल न करें, सरकार से सवाल न पूछें और केवल अंधभक्त बने रहें। ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के नारे के बाद अब क्या प्रधानमंत्री ‘दिमाग-मुक्त भारत’ बनाना चाहते हैं?

दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि देश के युवाओं, खासकर जेन ज़ी को बदनाम करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि देश के युवा रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, लोकतंत्र और अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछ रहे हैं। उनके सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें बदनाम करना सरकार की कमजोरी को दिखाता है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषण में देश की वास्तविक समस्याओं—बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था, महंगाई और युवाओं के भविष्य का कोई ठोस समाधान नहीं दिखा। देश को भरोसा और समाधान चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण से भरोसा पैदा होने के बजाय धमकी और डर का माहौल पैदा होता है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। असहमति को देशद्रोह, आंदोलन को नक्सलवाद और सवाल पूछने वाले युवाओं को ‘दिमागी नक्सल’ कहना लोकतांत्रिक भारत की परंपरा के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि देश के युवा डरेंगे नहीं, सवाल पूछेंगे और लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे।

माले नेता ने बिहार में हो रहे सामंती उत्पीड़न की निंदा की और कहा कि दिनारा में चंदेश्वर चौधरी के परिजनों से अब तक सरकार का कोई आदमी मिलने तक नहीं गया है। यह सरकार की संवेदनहीनता और गरीबों के प्रति उसके रवैये को दिखाता है।

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