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बड़ा आसान हो गया है सामाजिक माध्यम पर खुद की चलचित्र बनाकर सस्ती लोकप्रियता लेना

पहली तस्वीर पाकिस्तानी की,

दूसरी तस्वीर बांग्लादेशी की,

तीसरी तस्वीर भारतीय की।

सामाजिक माध्यम का नशा लड़कियों के सिर चढ़ कर बोल रहा है।

पहली तस्वीर वाली एक शादीशुदा महिला है और शिक्षिका है। इसने सामाजिक माध्यम को अस्त-व्यस्त कर दिया। अपने छात्र के साथ चलचित्र में अपनी बातों से उत्सुकता कैसे बढ़ाई जाती है, यह दिखाया।

दूसरी वाली ने उसी नमूने पर अपने कनिष्ठ छात्र के साथ चलचित्र बनाकर सामाजिक माध्यम पर डाल दिया और क्रम-विधि को अपने वश में कर लिया।

अब भारतीय पीछे क्यों रहे? उसने भी उसी तर्ज पर उसी नमूने के वस्त्र पहन कर सामाजिक माध्यम को स्तब्ध कर दिया।

अब सवाल है, क्या इन्हें लज्जा या शर्म-हया नहीं लगती कि जानबूझकर सामाजिक माध्यम पर उत्सुकता बढ़ाने वाली चलचित्र डालकर खुद को चलन में रखा जाए?

क्या इनके माता-पिता और रिश्तेदारों तक इनकी करतूत नहीं पहुँचती है?

कुछ लोग कहते हैं, अभिनय करना भी प्रतिभा है, कला है, अब इक्कीसवीं सदी चल रही है, महिलाएँ स्वतंत्र हैं, स्वतंत्रता है, अपना जीवन जिस तरह चाहे गुजारें, किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए।

बिल्कुल, मैं इस बात से असहमत हूँ। सबका अपना-अपना जीवन है, लेकिन मर्यादित रहना भी हमारी संस्कृति का एक हिस्सा है। महिलाएँ सुंदर तब लगती हैं जब वह मर्यादा में, संस्कार से रहती हैं।

दो पल की लोकप्रियता और व्यापक प्रसार के लिए खुद को कैमरे के सामने निर्लज्ज करना बिल्कुल उचित नहीं है।

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