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एक जमाना था ” पुलिस अफसर की मूंछ-कथा!”

एक जमाना था कि मूंछे व्यक्ति के शौर्य-पुरुषार्थ का प्रतीक मानी जाती थी.

उत्तर प्रदेश में IPS प्रशांत कुमार जब मेरठ के ADG बने तो उन्होने बड़ी-बड़ी मूंछे रखी. खूब बड़ी-बड़ी मूंछे. सैकड़ों बदमाशों को उनकी टीम ने मार गिराया. खूब पुरूषार्थ दिखाया. उनकी मूंछों की दूर-दूर तक चर्चा होती थी. इतनी चर्चा की यूपी पुलिस में उनके जैसी शानदार मूंछे अब भी किसी के पास नही है.

मगर उसी पुलिस का दुर्भाग्य देखिये. CO अशोक कुमार सिंह सामने खड़े सपाईयों को अपना पुरूषार्थ बखान कर रहे है. अपनी नेमप्लेट दिखाकर कहते है-“बना लो वीडियो, खूब बना लो और अखिलेश यादव को दिखा भी देना.” इसी दौरान अपना पुरूषार्थ प्रदर्शित करने के लिए उनका हाथ बरबस अपनी मूंछों की ओर जाता है. वह अपनी मूंछ के दोनों ओर उंगलियों से मरोड़ा तो देते है लेकिन उनकी मूंछे इतनी छोटी है कि उनकी उंगलियों में भी मूंछों का एक बाल तक नही मरोड़ा जा सकता है.

वीडियो क्या है, कैसा है इसका मेरे से कोई कन्सर्न नही लेकिन सीओ साहब! “हाथ में न आ सकने वाली मूंछों” को मरोड़कर “मूंछवालों” का अपमान ना कीजिए. अगर मूंछ पर ताव देने का शौक है तो बड़ी-बड़ी मूंछे रखिये. प्रशांत जी की तरह.

और सरकार तो आपको दाढ़ी-मूंछों की केयर करने के लिए हर महीने पैसा भी देती है. मेरी बात चुभी हो तो माफी लेकिन मूंछे ताव देने से पहले बड़ी कीजिए. “पुआल के पूरे” देखे होगे, मूंछे उसी तरह मोटी और तगड़ी होनी चाहिए.

एक बात और मूंछे मोटी-तगड़ी हो तो उसका सामने वाले पर प्रभाव भी पड़ता है. थी.

लेखक = रोहतास  उर्फ अजय दीक्षित

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