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प्रधान संपादक – मुन्नी देवी दीक्षित | अपने अधिकार जानिए
नई दिल्ली/अलीगढ़, 27 अक्टूबर 2026*
कबीरा खड़ा बाजार में, लिये लुकाठी हाथ,
जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ।
आखिर कबीर ने अपने साथ चलने के लिए अपना घर जलाने की इतनी कठिन शर्त क्यों रखी? बाजार में खड़े कबीर के साथ चलने को कई लोग तैयार थे, फिर भी उन्होंने यह अनोखी शर्त लगाकर अपनी राह और कठिन क्यों बना ली?
कहते हैं, इसकी वजह यह थी कि जिस राह पर कबीर को जाना था, वहाँ घर बचाकर चला ही नहीं जा सकता।
आज की दुनिया और घर की चिंता*
कबीर की बात को कबीर पर छोड़ भी दें, तो भी सवाल हमारा पीछा नहीं छोड़ते। हम आज की दुनिया में रहते हैं, अपने घर-परिवार की कदर करते हैं। दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा भी हमारे मन में इसीलिए आती है कि जैसी दुनिया बनती जा रही है, उसमें हमारा परिवार सुरक्षित नहीं रह सकता।
लेकिन दिक्कत यही है कि कोई भी छोटी या बड़ी लड़ाई, अगर उसका थोड़ा भी संबंध न्याय-अन्याय, सही-गलत से है, तो घर-बार का कुछ न कुछ हिस्सा कुर्बान किए बिना आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता।
*करियर की चिंता छोड़नी पड़ती है*
करियर न सही, करियर की चिंता तो छोड़नी ही पड़ती है। 2011-12 में अन्ना आंदोलन के समय केजरीवाल ने भी युवाओं से कहा था – “देश के लिए एक हफ्ता दे दो, करियर फिर बन जाएगा।” अगर वे युवा परीक्षा और करियर की चिंता स्थगित न करते, तो वह आंदोलन वहीं दम तोड़ देता।
हालांकि स्थगन से यात्रा सिर्फ शुरू होती है। यात्रा जारी रखनी है तो इच्छाओं के साथ-साथ अपने अंदर के डर को भी जलाना पड़ता है। इसीलिए कबीर पूरे घर को जलाने की शर्त रखते हैं। मन के अंदर बसे घर की कोई चीज बची रह गई, तो वही आगे बढ़ने के इरादे पर पानी फेर देती है।
*अविचल मूर्ति की मिसाल*
करियर की चिंता स्थगित करने की शर्त दीपक और उनकी टोली ने भी पूरी की थी। लेकिन जब जेल में डालकर जमानत की उम्मीदें टाली जाने लगीं और यह डर गहराने लगा कि कहीं पूरी जिंदगी जेल में ही न काटनी पड़े, तो डटे रहने का निश्चय टूटने लगा और पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर होने लगे।
ऐसे में अपवाद बनी वह अविचल, दुबली-पतली सी काया, जिसने एक आर्मी अफसर पिता की देखरेख में खुद को तपाने की ट्रेनिंग पाई थी और विचारों के अंगारों में सोने सा निखरना सीखा था। कबीर की कसौटी पर खुद को पहले ही न परखा होता, तो वह फासीवादी पैंतरों के सामने इस तरह टिक ही नहीं पाती।
*निष्कर्ष:* कबीर का घर फूंकना मकान जलाना नहीं, मन के अंदर के मोह, लोभ और डर को जलाना है। आज भी कोई बड़ी लड़ाई बिना इस त्याग के पूरी नहीं होती।
—*लेखक:* मुन्नी देवी दीक्षित, प्रधान संपादक
(9458031160, 7900646571)