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महिला वकीलों की सुरक्षा के लिए अलग नियम- सुप्रीम कोर्ट ने कानून का ढांचा बनाने का सुझाव दिया

श्रीमती मुन्नी देवी दीक्षित, प्रधान संपादक?

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013’ महिला वकीलों पर एक ही तरह से (बिना किसी बदलाव के) लागू नहीं किया जा सकता [सीमा जोशी बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया]।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने देश भर की अदालतों और ट्रिब्यूनलों में प्रैक्टिस करने वाली महिला वकीलों की सुरक्षा के लिए एक अलग रेगुलेटरी फ्रेमवर्क (नियम-कानून का ढांचा) बनाने का सुझाव दिया।

कोर्ट ने मौजूदा लैंगिक संवेदनशीलता नियमों की समीक्षा करते हुए, कानूनी पेशे में महिलाओं के लिए नियमों का एक व्यापक सेट तैयार करने के लिए अलग-अलग हितधारकों के बीच संयुक्त परामर्श की बात कही।

कोर्ट ने महिला वकीलों के लिए कानूनी सुरक्षा की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।

भारत के सुप्रीम कोर्ट में लैंगिक संवेदनशीलता और महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनयम, 2013′ की समीक्षा करते हुए, बेंच ने बताया कि मौजूदा ढांचा केवल सुप्रीम कोर्ट के परिसर तक ही सीमित है।

कोर्ट ने कहा, “इन नियमों का दायरा बढ़ाने के लिए – जिसमें हाई कोर्ट, जिला न्यायपालिका के तहत सभी अदालतें, केंद्र और राज्य सरकारों के तहत ट्रिब्यूनल और अन्य अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण आदि शामिल हों – यह जरूरी है कि नियमों का एक अलग सेट बनाया जाए। क्योंकि हम पाते हैं कि कानूनी पेशे से जुड़ी पीड़ित महिलाओं के लिए अधिनियम के प्रावधानों को एक ही तरह से (बिना किसी बदलाव के) लागू नहीं किया जा सकता है।”

इस कमी को दूर करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से संयुक्त परामर्श करने और न्यायिक, अर्ध-न्यायिक और ट्रिब्यूनल मंचों पर लागू होने वाले नियमों का एक समान सेट तैयार करने को कहा।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से पेश वकील राधिका गौतम ने कहा कि वह निर्देश लेंगी और महिला वकीलों के लिए एक समान नियम लाने का प्रयास करेंगी।

कोर्ट ने आदेश दिया, “हम बीसीआई के वकील से यह भी अनुरोध करते हैं कि वे राज्य बार काउंसिलों से पता करें कि क्या इस संबंध में कोई मौजूदा नियम लागू किए जा रहे हैं।”

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