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*अपने अधिकार जानिए | यात्रा विशेष*
*लेखक : रोहताश दीक्षित (उपसंपादक)
भारत में गंगा को माँ कहा जाता है तो सरस्वती को विद्या की देवी। बचपन में जब किताब खोलते थे तो पहले प्रणाम करते थे, पाँव लग जाए तो अपराध बोध होता था। उसी सरस्वती नदी के बारे में किंवदंती है कि वह पहाड़ों से निकली, वहीं गुम हो गई और फिर सीधे प्रयागराज में गंगा-यमुना के संगम पर प्रकट हुई, तभी उसे त्रिवेणी कहा गया।
ऐसी नदी का उद्गम देखने का लोभ मैं बड़ी उम्र में भी रोक नहीं सका।
*माणा से आगे का रहस्य*
सरस्वती का उद्गम देवताल से माना जाता है। बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर दूर है भारत का आखिरी गाँव माणा। इसी रास्ते से पाँचों पांडव और द्रौपदी स्वर्गारोहण को गए थे, कहते हैं युधिष्ठिर ही पहुँच पाए। रास्ता इतना कठिन है कि उम्रदराज के लिए काल बन जाता है।
माणा पार करते ही सरस्वती अपने वेगवान रूप में दिखती है। भीम पुल पर पहुँचते ही दाईं तरफ झक सफेद सरस्वती दो धाराओं में बँटकर नीचे गिरती है, बाईं ओर थोड़ी दूर तक दिखकर फिर गुम हो जाती है और बाद में केशव प्रयाग में अलकनंदा में मिल जाती है।
सीमा दर्शन यात्रा*
पिछले कुछ सालों से श्री सुभाष थलेड़ी जी के प्रयासों से “श्री देवताल – माणा पास सीमा दर्शन विरासतीय यात्रा” शुरू हुई है। इसका मकसद लोगों को अपनी सीमा और सरस्वती का उद्गम दिखाना है। श्रीनगर (गढ़वाल) के कवि मित्र नीरज नैथानी ने पूरी जानकारी दी।
माणा से आगे देवताल तक का पूरा क्षेत्र सेना, गढ़वाल रेजीमेंट और ITBP के अधीन है। जाने के लिए प्रशासन से परमिट लेना पड़ता है – मेडिकल सर्टिफिकेट, पुलिस वेरिफिकेशन और एफिडेविट के बाद। मेरा परमिट अपने अधिकार जानिये के वरिष्ठ पत्रकार रोहिताश दीक्षित और जोशीमठ राजेश नंबूरी और थलेड़ी जी ने कराया।
परमिट मिलने के बाद भी किस्मत*
17-18 सितंबर के लिए परमिट मिला। परमिट मिलना मतलब देवताल पहुँचना नहीं। मौसम साफ हो, बारिश-बर्फबारी न हो, तभी जा सकते हैं। देवताल 18,000 फीट पर है, तेज बर्फीली हवाएँ और रोज बर्फबारी। सौभाग्यशाली ही पहुँच पाते हैं।
हम 14 सितंबर को गाजियाबाद से निकले, श्रीनगर रुके और 15 को बद्रीनाथ। 16 को वसुधारा (12,500 फीट) और 17 को देवताल की योजना बनी।
गाजियाबाद 700 फीट और 33 डिग्री वाला शहर, श्रीनगर 1800 फीट, बद्रीनाथ 10,000 फीट पर -2 से 8 डिग्री, वसुधारा उससे भी 2-3 डिग्री कम और देवताल -2 से 5 डिग्री। सितंबर ही एक महीना है जब यहाँ बर्फ पिघलती है। शरीर इतनी जल्दी कैसे ढले? सभी को परेशानी हुई, उम्रदराज को ज्यादा, कुछ को ऑक्सीजन देनी पड़ी।
*तीन जगह चेकिंग*
बद्रीनाथ से माणा की तरफ बाएँ और देवताल की सड़क दाएँ कटती है। इस पर आम लोग नहीं चलते। थोड़ा आगे सरस्वती फिर दिखी, यहाँ तीन धाराओं में। चेकपोस्ट पर परमिट और चेहरा मिलाकर ही आगे जाने दिया। तीन जगह – गढ़वाल रेजीमेंट, ITBP और सेना ने अलग-अलग चेकिंग की। हम 18 लोग थे।
देवताल से थोड़ा पहले रोक दिया गया – ऊपर बर्फ पड़ रही है, आदेश है आगे न जाने दिया जाए। निराशा हुई। नीरज जी ने बताया पिछली बार तो इससे पहले ही लौटा दिया था। थोड़ी देर बाद इजाजत मिली, चेहरे खिल उठे। अब साँस लेने में दिक्कत, पेट फूलना, सीने में भारीपन।
*आखिरी 500 मीटर*
देवताल से 500 मीटर पहले सेना ने फिर रोका – अब गाड़ी नहीं, पैदल जाना होगा। ऑक्सीजन की कमी में एक-एक कदम भारी। पहले राक्षस ताल, फिर मानव ताल और आखिर में देवताल।
मुझसे चला नहीं जा रहा था, तभी सेना की बर्फ पर चलने वाली छोटी गाड़ी आई, मुझे बैठाकर देवताल पहुँचा दिया। वहाँ सेना ने ही हनुमान मंदिर बनाया है, पूरी शेड बर्फ से ढकी, कँटीली हवाएँ, रुकना मुश्किल। मैं ड्राइवर के सहारे 500 मीटर वापस आया, गाड़ी में लेट गया। नीचे उतरने पर जवानों ने चाय पिलाई, हीटर वाले गोल घरों में बैठाया, ऑक्सीजन दी, तब जान में जान आई।
यह यात्रा सिर्फ एक नदी का उद्गम देखना नहीं थी, यह अपनी सीमा, अपने जवानों के अदम्य साहस और प्रकृति की विराटता को नमन करने की यात्रा थी।