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15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू के सामने एक ऐसा भारत था जिसकी 82% से अधिक आबादी पूरी तरह अनपढ़ थी और महिलाओं में साक्षरता दर 9% से भी कम थी।
उस वक्त जब 1 लाख 40 हज़ार जर्जर स्कूलों के सिवा देश के पास कुछ नहीं था, तब गाँव के लोग हँसते हुए कहते थे “अरे साहिब, इन भूखे पेट बच्चों को किताब थमाकर क्या पेट भरेगा? हमारा काम तो खेतों में मजदूरी से चलता है।” लेकिन नेहरू का अटूट विश्वास था कि बिन पढ़े यह देश कभी अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो सकता;
इसीलिए 1951-52 के ₹19.8 करोड़ के मामूली शिक्षा बजट को उन्होंने 1960-61 तक ₹114 करोड़ से ऊपर पहुँचाया, 4, लाख से अधिक नए स्कूल खड़े किए, और IIT खड़गपुर (1951), AIIMS (1956) तथा UGC (1956) जैसी संस्थाओं की नींव रखकर एक लाचार जनता की आँखों में स्वाभिमान और सपनों का दीया जलाया।
आजादी के वक्त जब देश में केवल 5.38 लाख प्राथमिक शिक्षक थे, तब गाँव-देहात के रूढ़िवादी माहौल में बच्चों को स्कूल भेजना किसी जंग से कम नहीं था, जहाँ लोग कहते थे “लड़कियों को पढ़ाकर कौन सी अफ़सरी करानी है?”
पंडित नेहरू जानते थे कि जब तक एक माँ शिक्षित नहीं होगी, तब तक पूरा परिवार अंधेरे में रहेगा; इसीलिए उन्होंने 1965 तक 15 लाख से अधिक सरकारी अध्यापकों की भर्ती की और शिक्षकों को घर-घर जाकर परिजनों के हाथ जोड़कर बच्चों को स्कूल भेजने के लिए मनाया।
बच्चों को खींचकर लाने के लिए स्कूलों में मुफ्त किताबें, गर्म पौष्टिक खाना और फल देने जैसी भावुक और मानवीय पहल शुरू की गईं, ताकि एक गरीब बाप को यह न सोचना पड़े कि उसका बच्चा भूखा सोएगा या पढ़ेगा, और इसी सोच ने अनुच्छेद 45 के तहत मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा को देश का नैतिक संकल्प बनाया।
दूसरी तरफ आज 2014 के बाद की तथाकथित ‘विश्वगुरु’ क्रांति का कड़वा सच यह है कि UDISE+ के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के 10.22 लाख सरकारी स्कूलों में लगभग 7 से 9 लाख शिक्षकों के पद धूल फांक रहे हैं, जिससे गरीब माँ-बाप रो-रोकर अपने बच्चों का भविष्य टूटते देखने पर मजबूर हैं।
सरकारी व्यवस्था को जानबूझकर जर्जर बनाकर बच्चों को प्राइवेट माफियाओं के हवाले धकेल दिया गया है, जहाँ 50 हजार से 2 लाख की मोटी फीस, चमचमाती ड्रेस और महंगी किताबों के नाम पर लाचार परिवारों की जेबें काटी जा रही हैं।
जिस गरीब बाप ने कभी सोचा था कि उसका बच्चा पढ़कर उनका नाम रोशन करेगा, आज वही बाप प्राइवेट स्कूलों की भारी-भरकम फीस भरने के लिए अपनी जमीन और जेवर गिरवी रखने पर मजबूर है।
जहाँ 1966 के कोठारी कमीशन से लेकर NEP 2020 तक देश की GDP का कम से कम 6% शिक्षा पर खर्च करने की कसम खाई गई थी, वहीं आज केंद्र और राज्यों का कुल शिक्षा व्यय महज ~2.9% से 3.1% के बीच दम तोड़ रहा है, जो यह दर्शाता है कि सत्ता के लिए जनता की शिक्षा कोई प्राथमिकता ही नहीं है।
2024-25 के बजट में ₹1.20 लाख करोड़ का आवंटन 26.5 करोड़ बच्चों के देश के लिए केवल एक क्रूर मजाक बनकर रह गया है। REET, UP पुलिस भर्ती, NEET-UG और UGC-NET जैसी दर्जनों परीक्षाओं के पेपर बार-बार बिकते हैं, और जब सालों-साल पसीना बहाने वाले छात्र और उनकी बिलखती माँ-बहनें सड़कों पर अपने हक की भीख माँगने उतरती हैं, तो उन पर लाठियाँ बरसाई जाती हैं और उनकी चीखों को सत्ता के अहंकार के तले कुचल दिया जाता है।
एक तरफ 1947 का वह दौर था जब भयंकर गरीबी और संसाधनों के अभाव के बावजूद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक पिता की तरह इस मुल्क के हर बच्चे को गले लगाया, उनके लिए अरबों रुपये के शिक्षण संस्थान बनाए और एक अनपढ़ देश को दुनिया के सामने सीना ठोककर सवाल पूछने के काबिल बनाया।
दूसरी तरफ आज का दौर है जहाँ सार्वजनिक शिक्षा का जनाज़ा निकालकर केवल धर्म के नाम पर नफ़रत, राजनीतिक रैलियों और निजी पूंजीपतियों की तिजोरियों को समृद्ध किया जा रहा है
ताकि आने वाली नस्लें सवाल पूछना भूल जाएँ और ताउम्र एक लाचार प्रजा बनकर रह जाएँ।
✍️ लेखक रोहतास उर्फ अजय, दीक्षित