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रोहिताश दीक्षित उपसंपादक
राहुल गांधी जी, जब आप लोकतंत्र और संस्थाओं की बात करते हैं तो अपनी माताजी श्रीमती सोनिया गांधी की भूमिका भी याद कर लीजिए। UPA के 10 साल के शासन का सच यह है कि देश में दो सत्ता केंद्र थे – एक दिखावे का प्रधानमंत्री और दूसरा 10 जनपथ पर बैठा असली सत्ता केंद्र। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) की अध्यक्षा के रूप में सोनिया गांधी ने देश में एक समानांतर सरकार चलाई।
यह NAC कोई संवैधानिक संस्था नहीं थी, फिर भी हर बड़ी फाइल, हर बड़ी नीति पहले NAC से पास होती थी, फिर PMO जाती थी। पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपनी किताब “द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर” में सही लिखा है कि सभी फाइलें सोनिया गांधी की मंजूरी के लिए भेजी जाती थीं। डॉ. मनमोहन सिंह जैसे सम्मानित अर्थशास्त्री को इस व्यवस्था ने महज एक कठपुतली बनाकर रख दिया था, जिनकी एकाकीपन की पीड़ा का जिक्र खुद नटवर सिंह ने किया है – 2004 में प्रधानमंत्री बनने के एक महीने बाद ही बैंकॉक में उन्होंने नटवर सिंह से कहा था कि वे कितने अकेले हैं।
यह अहंकार सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं था। सम्माननीय विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के अपमान की कहानी भी इसी अहंकार की देन है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने खुद इसका खुलासा किया है।
15 अगस्त 1997 को इंदिरा गांधी स्मारक ट्रस्ट के सम्मेलन में जाम्बिया के पूर्व राष्ट्रपति, अफ्रीका के सबसे सम्मानित नेता केनेथ कौंडा भारत आए थे। वे इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के पुराने मित्र थे। पहले वे हमेशा ललित सूरी के होटल में ठहरते थे। सोनिया गांधी ने जिद्द करके तय किया कि इस बार सभी मेहमान ओबेरॉय में ठहरेंगे। कौंडा लंबी उड़ान के बाद सीधे सूरी के होटल पहुंच गए और आराम करने लगे।
जब नटवर सिंह ने यह सूचना सोनिया गांधी को दी तो वे भड़क गईं। उन्होंने नटवर सिंह को दो बार कौंडा के पास भेजा कि वे होटल बदलें। कौंडा ने कहा कि यह विचित्र स्थिति होगी, “भला सूरी से मैं क्या कहूंगा”। वे सोनिया गांधी से 22 साल बड़े थे, अफ्रीका के पूज्य नेता थे। इंदिरा और राजीव ने कभी किसी विदेशी मेहमान से ऐसा रूखा व्यवहार नहीं किया था। पर सोनिया गांधी का अहंकार हावी था। आखिरकार कौंडा को क्षमा मांगकर होटल बदलना पड़ा। जैसा नटवर सिंह ने लिखा है – “सोनिया जानबूझकर सनकीपन दिखा रही थीं। यह उन्हें शोभा नहीं देता था।”
और जब सच बाहर आने लगा तो बेचैनी बढ़ गई। नटवर सिंह की किताब “वन लाइफ इज नॉट इनफ” इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
नटवर सिंह लिखते हैं कि जब वे पुस्तक को अंतिम रूप दे रहे थे, तो 7 मई 2014 को सोनिया गांधी अपनी बेटी प्रियंका के साथ अचानक उनके जोरबाग स्थित निवास पर आ गईं। 6 मई को प्रियंका ने फोन करके मिलने का समय मांगा था। नटवर सिंह के अनुसार सोनिया गांधी जरूरत से ज्यादा मित्रवत व्यवहार कर रही थीं, जो उनके व्यक्तित्व के एकदम विपरीत था। वे अपना अहंकार ताक पर रखकर “करीबी दोस्त” से मिलने आई थीं – ऐसा करने में उन्हें साढ़े आठ साल लग गए।
क्यों? क्योंकि वे आशंकित थीं, शायद किसी बड़े खुलासे के डर से। वे चाहती थीं कि यह किताब न छपे। उन्होंने चिरौरी की कि मई 2004 की घटनाओं को न लिखा जाए – यानी वह सच जब सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बनीं और मनमोहन सिंह को कुर्सी दी गई।
नटवर सिंह ने सबसे करारा प्रहार यही किया है – “कोई भारतीय कभी ऐसा आचरण नहीं कर सकता जैसा सोनिया गांधी ने किया। उनके मन में एक अभारतीय कोना है जो लोगों को भावनाशून्य होकर अपनी जिंदगी से बाहर फेंकने के उनके अंदाज से जाहिर होता है। वे 19 साल की थीं तब से भारत में हैं, उन्होंने भारत की हर चीज को घोटकर पी लिया है, फिर भी उनके व्यक्तित्व का 25 प्रतिशत हिस्सा कभी नहीं बदल सकता।”
यही है UPA मॉडल का सच – एक निर्वाचित प्रधानमंत्री का मजाक, संस्थाओं को NAC के हवाले करना और अहंकार में विदेशी मेहमानों तक का अपमान।