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चमचा vs अंधभक्त – ट्रेन वाली बहस

चमचे की वह बात सुन अंधभक्त फिर किसी से भी नज़र नहीं मिला पाया। बाकी सफ़र में वह कंबल से मुँह ढके ही रहा।

यह कल की बात है। मैं ट्रेन से लखनऊ से दिल्ली जा रहा था। एक चमचे और एक अंधभक्त के बीच ज़ोरों की बहस चल रही थी। बहस का मुद्दा था कि चमचा बड़ा या अंधभक्त।

अंधभक्त ने अपने नेता के जन्मदिन के अवसर पर देशभर में करोड़ों दिए जलाने की बात कही। अपने नेता के नाम पर स्टेडियम होने की बात कही। महँगाई बढ़ने के बावजूद अपने नेता को पूजते रहने की बात कही। और न जाने क्या-क्या कहा।

अब चमचे की बारी थी। उसने कहा, “तुम अपने नेता के नाम पर एक स्टेडियम बन जाने पर इतना इतरा रहे हो। हमारे नेताओं नेहरू जी और इंदिरा जी ने तो अपने जीते-जी स्वयं को भारत रत्न दे डाला। नेहरू जी ने तो अपनी स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर को सुझाव तक दे डाला कि उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाए। 1959 में हमारे नेहरू जी के जन्मदिन के अवसर पर हम चमचों ने पूरा ध्यानचंद स्टेडियम बच्चों से खचाखच भर दिया था और उसमें नेहरू जी उपस्थित थे। हमने कभी भी इन बातों पर घमंड नहीं किया। वे मालिक हैं, हम चमचे हैं। इमरजेंसी पर तक तो हमने घमंड नहीं किया, तो छोटी-मोटी बातों पर हम क्या ही घमंड करें। मूर्ख, तुम कितनी भी तरक्की कर लो, लेकिन कभी भी हम चमचों के बराबर पहुँच ही नहीं सकते।”

यह गरमा-गरम बहस रात के दो बजे तक चलती रही। पूरी बोगी में कोई भी नहीं सो पा रहा था, लेकिन किसी ने भी उनको टोका नहीं क्योंकि सबको मज़ा आ रहा था। अंधभक्त उस चमचे की बात सुनकर अब तक घायल हो चुका था। चमचे का उद्देश्य एक अंतिम वार करके उसे मूर्छित करना था।

चमचे ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। वह बोला —

“आओ, आज एक उदाहरण देखें और तुम्हारी शर्म में और इज़ाफ़ा करवाएँ और तुम्हें यह दिखाएँ कि तुम अंधभक्त हम चमचों के सामने कहीं भी नहीं ठहरते।

1971 की बात है। हमारे मालिक राहुल गांधी जी की एक ‘रिश्तेदार’ थीं इंदिरा गांधी। इंदिरा गांधी के एक ‘रिश्तेदार’ थे संजय गांधी। संजय गांधी ने एक निजी कंपनी बनाई — मारुति लिमिटेड। यह मारुति लिमिटेड वर्तमान की मारुति लिमिटेड नहीं है। संजय गांधी की कंपनी को दिल्ली से ‘हज़ारों किलोमीटर’ दूर गुड़गाँव नामक स्थान पर औने-पौने दामों पर 300 एकड़ ज़मीन दे दी गई। राहुल गांधी जी की दूर की रिश्तेदार इंदिरा गांधी ने बड़े प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि वे संजय गांधी की इस कंपनी की तरक्की के लिए दिन-रात एक कर दें। इंदिरा जी के निर्देशों पर सरकारी बैंकों ने इस कंपनी को ऋण देने के लिए अपनी तिजोरियाँ खोल दीं।

यह मामला संसद में उठा। इंदिरा गांधी ने संसद में गलत रिपोर्टिंग करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों पर भरपूर दबाव बनाया।

19 दिसंबर 1978 को भारतीय राजनीति में बड़ा भूचाल आया, जब लोकसभा ने राहुल जी की इस दूर की रिश्तेदार दुर्गा समान इंदिरा गांधी की सदस्यता समाप्त कर दी और विशेषाधिकार हनन के मामले में उन्हें जेल भेज दिया।

लेकिन हम चमचे डरे नहीं।

आगे के घटनाक्रम को सुनकर अंधभक्तो, तुम शर्म करना। आज से जब भी भविष्य में तुम्हें अपने आसपास कोई चमचा मिले, उनके चरण स्पर्श करना और उनसे आशीर्वाद लेना। अब सुनो आगे की कहानी —

राहुल जी की इस रिश्तेदार इंदिरा जी की गिरफ्तारी के एक दिन बाद, अर्थात 20 दिसंबर 1978 को इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-410, जो कोलकाता से लखनऊ होते हुए दिल्ली जा रही थी, कांग्रेस के दो ‘क्रांतिकारियों’, भोलानाथ पांडेय और देवेंद्र पांडेय, ने हाईजैक कर ली। विमान में 126 यात्री और 6 चालक दल के सदस्य सवार थे। अपहर्ताओं ने खिलौना पिस्तौल और नकली बम के सहारे कॉकपिट पर क़ब्ज़ा किया और विमान को वाराणसी उतरने के लिए मजबूर कर दिया।

वाराणसी हवाई अड्डे पर पूरी रात प्रशासन और अपहर्ताओं के बीच बातचीत चली। उनकी प्रमुख माँगें थीं — इंदिरा जी की रिहाई, संजय गांधी पर चल रहे मुकदमों की वापसी और जनता सरकार का इस्तीफ़ा।

मूर्ख अंधभक्त! तुम्हें तुम्हारा प्रधानमंत्री देता ही क्या है, सिवाय टैक्स के। लेकिन ज़रा यह देखो, राहुल जी की रिश्तेदार इंदिरा जी ने इन दो महान क्रांतिकारी चमचों को क्या दिया —

1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के बाद इन क्रांतिकारी चमचों के विरुद्ध चल रहा मुकदमा वापस ले लिया गया। इसके बाद कांग्रेस ने इन दोनों क्रांतिकारियों को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के टिकट का तोहफ़ा दिया और दोनों चुनाव जीतकर विधायक बने।

क्रांतिकारी भोलानाथ पांडेय बलिया से दो बार विधायक चुने गए। आगे चलकर वे अखिल भारतीय युवा कांग्रेस तथा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पदों पर भी रहे।

क्रांतिकारी देवेंद्र पांडेय सुल्तानपुर ज़िले की जैसिंहपुर सीट से लगातार दो बार विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भी बने और लंबे समय तक प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने गए।

कांग्रेस अपने महान चमचों का कितना ख़याल रखती है, देखा तुमने। मूर्ख अंधभक्त! जिस देश में इतने क्रांतिकारी चमचे हैं, उस देश में क्या तुम समझ रहे हो कि राहुल गांधी को बहुत लंबे समय तक दिल्ली की कुर्सी पर बैठने से रोक पाओगे। यह तुम्हारे बस की बात नहीं है।

मूर्ख अंधभक्त, तुमने बहुत अच्छे दिन देख लिए हैं। अब तुम फिर से कांग्रेस सरकार का स्वर्णिम-युग देखोगे। और भविष्य में कभी भी इस बहस में न पड़ना कि अंधभक्त बड़े या चमचे बड़े। तुम्हारी हैसियत ही क्या है हम चमचों के सामने।

गरमा-गरम बहस का आनंद लेने के बाद बोगी के सभी लोग सो गए। अंधभक्त को दिल्ली में उतरना था। शर्म के मारे वह गाज़ियाबाद में ही उतर गया। उतरने से पहले उसने चमचे के चरण स्पर्श किए।

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