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रोहतास दीक्षित उपसंपादक
14 सितंबर को पारित आदेश में जस्टिस डॉ. गौतम चौधरी ने कहा –
दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं, शिक्षित हैं और अपनी भलाई को समझने में सक्षम हैं।
– उनका एक साथ रहने का निर्णय स्वतंत्र सहमति, बिना किसी दबाव, डर या अनुचित प्रभाव के लिया गया है।
– दो वयस्क नागरिकों का अपनी पसंद से लिव-इन में रहना मौलिक अधिकार है, इसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानून के हवाले से कहा गया।
– परिवार, रिश्तेदारों या समाज के किसी भी वर्ग को उनकी शारीरिक स्वतंत्रता में बाधा डालने का कानूनी अधिकार नहीं है। वैवाहिक मान्यता का अभाव किसी को भी उनकी गरिमा और सुरक्षा पर हमला करने की स्वतंत्रता नहीं देता।
निर्देश क्या दिया गया -*
– जोड़े को अपने परिवार या किसी अन्य व्यक्ति के हस्तक्षेप के बिना शांतिपूर्वक एक साथ रहने की स्वतंत्रता है।
– यदि उनके लिव-इन में कोई बाधा आती है, तो पुलिस को यह सत्यापित करने के बाद कि वे बालिग हैं और स्वेच्छा से साथ रह रहे हैं, उन्हें तुरंत सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।
सुनवाई में क्या हुआ -*
– याचिकाकर्ताओं के वकील ने बताया था कि वे अविवाहित हैं, अलग-अलग धर्मों से हैं और लिव-इन में हैं, परिवार से जान का खतरा है इसलिए पुलिस सुरक्षा चाहिए।
– राज्य की ओर से तर्क दिया गया था कि समलैंगिक संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाता और यह समाज के प्राकृतिक और पारंपरिक ढांचे को प्रभावित करते हैं।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने और जोड़े से बातचीत के बाद सुरक्षा याचिका स्वीकार कर ली।