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बहुत प्राचीन काल की बात है। कुशिक वंश में जन्मे विश्वामित्र प्रारम्भ में एक महान पराक्रमी राजा थे। उनका जीवन राजसत्ता, युद्ध और ऐश्वर्य से भरा हुआ था। किंतु महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में घटित एक घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।

वसिष्ठ की आध्यात्मिक शक्ति और ब्रह्मतेज को देखकर विश्वामित्र के मन में यह संकल्प उत्पन्न हुआ कि वे भी ऐसी ही महान तपशक्ति प्राप्त करेंगे। उन्होंने राजपाट का त्याग किया और घोर तपस्या आरम्भ कर दी।
उनकी तपस्या इतनी प्रचण्ड थी कि देवताओं का लोक भी उससे प्रभावित होने लगा। विश्वामित्र केवल ऋषि-पद प्राप्त करके संतुष्ट नहीं थे; उनका लक्ष्य इससे भी ऊँचा था। वे ब्रह्मर्षि-पद प्राप्त करना चाहते थे।

हजारों वर्षों की कठोर साधना के बाद ब्रह्मा उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें ‘ऋषि’ होने का वर प्रदान किया। किंतु विश्वामित्र इससे संतुष्ट नहीं हुए। उनका मन अभी भी ब्रह्मर्षि-पद की प्राप्ति के लिए तपस्या में लगा रहा। वाल्मीकि रामायण में स्पष्ट रूप से आता है कि ब्रह्मा के लौट जाने के बाद विश्वामित्र ने पुनः महान तपस्या आरम्भ कर दी।
समय बीतता गया। एक दिन अप्सराओं में श्रेष्ठ मेनका पुष्कर तीर्थ पर स्नान करने आईं। उसी स्थान पर विश्वामित्र अपनी तपस्या में स्थित थे।
वाल्मीकि रामायण मेनका के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहती है कि विश्वामित्र ने उन्हें ऐसे देखा जैसे घने मेघों के बीच बिजली चमक उठी हो।
मेनका को देखकर विश्वामित्र का मन विचलित हो गया। रामायण में कहा गया है कि वे कामदेव के प्रभाव में आ गए और उन्होंने मेनका को अपने आश्रम में रहने का निमंत्रण दिया। मेनका ने उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

इसके बाद दोनों लंबे समय तक साथ रहे। वाल्मीकि रामायण में उनके साथ रहने की अवधि ‘दस वर्ष’ बताई गई है। इस अवधि में विश्वामित्र की तपस्या रुक गई।
महाभारत के आदिपर्व में वर्णित कथा के अनुसार विश्वामित्र और मेनका के संयोग से एक कन्या का जन्म हुआ। उस कन्या का नाम आगे चलकर ‘शकुन्तला’ पड़ा।
मेनका ने हिमालय के समीप बहने वाली मालिनी नदी के तट पर उस कन्या को जन्म दिया। जन्म के बाद उसने नवजात शिशु को वन में छोड़ दिया और स्वर्गलोक लौट गई।
मेनका के लौट जाने पर विश्वामित्र को अनुभव हुआ कि उनकी तपस्या का महान उद्देश्य उनसे दूर हो गया है। उन्हें अपनी साधना भंग होने का बोध हुआ। और वे पुनः कठोर तपस्या में प्रवृत्त हो गए।
विश्वामित्र केवल मेनका के कारण पराजित नहीं हुए थे; वास्तव में यह उनके अपने मन की परीक्षा थी। वर्षों की तपस्या के बावजूद उनके भीतर काम और क्रोध जैसी शक्तियाँ अभी पूर्णतः शांत नहीं हुई थीं। इसीलिए उन्होंने फिर तपस्या की—और इस बार अपने भीतर की दुर्बलताओं पर विजय पाने का प्रयास किया।
उन्होंने बार-बार स्वयं को साधा और अंततः वही विश्वामित्र आगे चलकर महान तपस्वी बने। रामायण में हम उन्हें महर्षि के रूप में देखते हैं जो राजा दशरथ के पास जाकर राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाते हैं। वे दोनों राजकुमारों को दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देते हैं और उन्हें ताड़का, मारीच तथा सुबाहु जैसे राक्षसों से युद्ध के लिए तैयार करते हैं।

आगे चलकर विश्वामित्र ही राम को मिथिला ले जाते हैं, जहाँ सीता स्वयंवर का महान प्रसंग घटित होता है। इस प्रकार मेनका के साथ उनका प्रसंग उनके जीवन का अंत नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।
विश्वामित्र ने पहले राजसत्ता को छोड़ा, फिर तपस्या की, फिर मोह में पड़े, फिर अपनी भूल को पहचाना और पुनः साधना में लौटे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे गिरने के बाद भी रुके नहीं।

मेनका और विश्वामित्र से उत्पन्न पुत्री शकुंतला का पालन-पोषण कण्व ऋषि ने किया जिसका विवाह राजा दुष्यंत से हुआ। राजा दुष्यन्त और शकुंतला के भरत नाम का पुत्र हुआ जिसके नाम पर ही हमारे देश का नाम भारत पड़ा।
॥ हर हर महादेव जय शिव शक्ति॥
रोहतास उर्फ अजय दीक्षित