1
1
रोहिताश दीक्षित उपसंपादक
नोएडा।* यमुना एक्सप्रेस-वे पर फिर वही मंजर। रात के अंधेरे में महोबा जा रही एक प्राइवेट AC स्लीपर बस आग का गोला बन गई और 9 जिंदगियां सेकंडों में खाक हो गईं। 35 से ज्यादा यात्री गहरी नींद में थे, AC के कारण खिड़कियां बंद थीं, इमरजेंसी गेट काम नहीं आया और धुआं ही मौत बन गया।
यह कोई पहला हादसा नहीं है। हर 2-3 महीने में यूपी में किसी न किसी प्राइवेट टूरिस्ट बस में आग, टायर फटना या पलटने से ऐसी ही मौतें होती हैं। सवाल यह है कि आखिर अनफिट और पुरानी डबल-डेकर बसें एक्सप्रेस-वे पर दौड़ कैसे रही हैं?
*3 बड़े सवाल जो सरकार से पूछने जरूरी हैं:*
*1. फिटनेस और परमिट का खेल:* नियम कहता है कि हर स्लीपर बस में 2 इमरजेंसी गेट, फायर एक्सटिंग्विशर, हैमर और फिटनेस सर्टिफिकेट जरूरी है। मौके पर बची बसों में अक्सर यह सब नदारद मिलता है। फिटनेस कैसे पास हो रहा है?
*2. डग्गामार बसों पर कार्रवाई क्यों नहीं:* नोएडा, आनंद विहार और कौशांबी से रोज सैकड़ों प्राइवेट बसें बिना निर्धारित स्टैंड के सड़क किनारे से सवारी भरती हैं। इनका कोई तय किराया नहीं, कोई सुरक्षा जांच नहीं।
*3. जांच सिर्फ कागजों में:* हर बड़े हादसे के बाद जांच कमेटी, मुआवजे का ऐलान और 2 दिन बाद सब भूल जाने का सिलसिला। जरूरत है हर बस की रियल टाइम GPS ट्रैकिंग, फिटनेस की ऑनलाइन वेरिफिकेशन और इमरजेंसी एग्जिट की अनिवार्य पुलिस जांच की।
सरकार ने इस बार मृतकों के लिए 2 लाख मुआवजे का ऐलान किया है, पर मुआवजा जान की कीमत नहीं हो सकता। अगर परिवहन विभाग अभी भी नहीं जागा, तो कल फिर कोई बस जलेगी और फिर हम सिर्फ 9 नहीं, 10, 15 लाशें गिनेंगे।