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श्रीमती मुन्नी देवी दीक्षित प्रधान संपादक
नई दिल्ली।* मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल से अनुमति मांगी गई है।
सुप्रीम कोर्ट के वकील *ब्रजेश सिंह* ने 24 सितंबर को अटॉर्नी जनरल *आर. वेंकटरमणी* को पत्र लिखकर ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971’ की धारा 15(1)(बी) और धारा 2(सी) के तहत सहमति मांगी है।
यह पत्र *‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की 23 सितंबर की रिपोर्ट* के बाद लिखा गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त *सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी* ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के फैसलों पर आपत्ति जताई है। रिपोर्ट के अनुसार ये आपत्तियां फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने और वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर थीं।
*वकील के पत्र में क्या आरोप हैं?*
वकील ब्रजेश सिंह ने पत्र में दो बड़े सुप्रीम कोर्ट फैसलों का हवाला दिया है –
1. टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ:* सिंह का तर्क है कि इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चुनाव आयोग बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है और CEC ‘समान अधिकारियों में प्रथम’ है, सर्वशक्तिमान नहीं। आयोग के फैसले पूरे आयोग के होते हैं। अन्य आयुक्तों को नजरअंदाज कर फैसले लेना इस नजीर का उल्लंघन है।
2. अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023):* इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव आयोग के महत्व पर जोर दिया था।
पत्र में आरोप लगाया गया है कि “पूर्ण आयोग” के नाम पर अन्य आयुक्तों की मंजूरी के बिना वोटर लिस्ट और डेटाबेस में बदलाव करना, संविधान के *अनुच्छेद 141* के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून की जानबूझकर अवहेलना है और इससे चुनावी पारदर्शिता की न्यायिक जांच में भी बाधा पड़ सकती है।
अब आगे क्या?*
कंटेम्प्ट एक्ट की धारा 15(1)(बी) के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना याचिका दायर करने के लिए अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति लेना जरूरी है। अगर AG सहमति देते हैं, तभी CEC के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही शुरू हो सकती है।
गौरतलब है कि 23 सितंबर को ही सुप्रीम कोर्ट ने CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी बेंच के पास भेज दिया था।