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एटा/अलीगंज।* अपने अधिकार जानिये के प्रधान संपादक के साथ एक विशेष आध्यात्मिक चर्चा में एक शिव भक्त ने अपने जीवन के गहरे अनुभव साझा किए। बातचीत संतों की पहचान, ब्रह्मचर्य और परमात्मा की इच्छा पर केंद्रित रही।
*सिद्ध पुरुष सादगी में जीते हैं -*
शिव भक्त ने बताया, “मैंने अपने जीवन काल में कई ऐसे संत देखे जो सिद्ध पुरुष थे, पर उन्होंने साधारण तरीके से ही जीवन जिया और लोगों का कल्याण भी करते रहे, जिनका नाम आज इतिहास में दर्ज है।”
*क्या वस्त्र से ही पहचान होती है?*
संपादक के इस सवाल पर उन्होंने बेबाक जवाब दिया – “वस्त्र धारण करने वाले ज्यादातर लोग व्यापारी होते हैं, वह अपना व्यापार करते हैं। असली पहचान वस्त्र से नहीं, कर्म और नियत से होती है।”
*परिवार में भक्ति की परंपरा -*
अपने परिवार के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “मेरे परिवार में भी भगवान के भक्त रहे हैं। मेरे बाबा दंडी स्वामी थे, मेरे चाचा एक संत थे और मेरे पिता भी भोलेनाथ के परम भक्त थे। मैं बचपन से ही ब्रह्मचारी था और आज भी ब्रह्मचारी ही हूं। बचपन से ही मेरी कोई अदृश्य शक्ति सहायता करती रही, आज बहुत कुछ है, यह सब परमात्मा की देन है।”
परमात्मा की जिसके ऊपर नजर होती है, वह व्यक्ति स्वयं अकेला ही होता है। मेरा भी परिवार है, घर में बच्चे हैं, बच्ची भी है। परिवार की जिम्मेदारी परमात्मा ने दी है, वह निभा रहा हूं। परमात्मा ने मुझे सहयोगी बनाया है।”
*त्याग का इतिहास -*
उन्होंने अपने परिवार के त्याग की कहानी सुनाई – “मेरे बाबा चार भाई थे, जिनमें से एक भाई की शादी नहीं हुई और उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपने भांजे को दे दी। मेरे चाचा श्री राजेंद्र प्रसाद जी की तो शादी हुई थी, पर उन्होंने पत्नी को त्याग दिया और संन्यासी हो गए।”
यह सब परमात्मा का लेख है। वही होता है जो परमात्मा करता है। व्यक्ति कहता है कि हम कुछ कर सकते हैं, यह गलत है। परमात्मा ही रास्ता दिखाता है, उसकी इच्छा के अनुसार ही व्यक्ति कुछ कर सकता है, अपनी मर्जी से कुछ नहीं।”
अंत में उन्होंने कहा, “बाकी लोगों का कहना है, किसी पर भी कोई इल्जाम लगा सकते हैं, व्यक्ति स्वतंत्र है पर परमात्मा सब देखता है। हर हर महादेव, जय शिव शक्ति।”