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श्रीमती , मुन्नी देवी दीक्षित, प्रधान संपादक?
नई दिल्ली, 22 सितंबर 2026:* सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि धार्मिक वजहों से ‘वंदे मातरम’ नहीं गाने वाले व्यक्ति को किसी आपराधिक परिणाम का सामना नहीं करना पड़ेगा।
मामला क्या है?
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच, कर्नाटक संगीत गायक और मैग्सेसे विजेता टीएम कृष्णा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम’ में 2026 में किए गए संशोधन को चुनौती दी गई है। इस संशोधन के तहत जानबूझकर ‘वंदे मातरम’ के गायन को रोकना या गाते समय सभा में बाधा डालना 3 साल तक की जेल वाला अपराध है। 5f31
कृष्णा का तर्क है कि वंदे मातरम के पूरे 6 अंतरों को अनिवार्य करने में बाद के 4 अंतरों में धार्मिक संदर्भ हैं, जो धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है और कानून अस्पष्ट है। 976c
कोर्ट में तीखी बहस:*
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और याचिकाकर्ता के वकील एस. मुरलीधर (पूर्व चीफ जस्टिस, ओडिशा हाईकोर्ट) के बीच “नक्सलवादी” शब्द को लेकर तीखी बहस हुई। मेहता ने कहा था – “कानून बनाना नक्सलियों की सोच के हिसाब से नहीं हो सकता”। मुरलीधर ने इस टिप्पणी को वापस लेने की मांग की, पर मेहता ने इनकार कर दिया। 5f31f6f4
कोर्ट का रुख:*
कोर्ट ने कहा कि वह नहीं तय करेगा कि राष्ट्रीय गीत में 2 अंतरे होने चाहिए या 6। कोर्ट का काम सिर्फ संवैधानिक सवाल देखना है। कोर्ट ने 1986 के ऐतिहासिक ‘बिजोइ इमैनुएल’ फैसले का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान न गाने वालों को संरक्षण दिया गया था। कोर्ट ने इसी संतुलन की बात कही – राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान बनाम धार्मिक स्वतंत्रता। 4766
कोर्ट ने SG मेहता से कहा कि वे याचिका पर 2 हफ्ते में जवाब दाखिल करें और इस बात की जांच की जाए कि क्या सिर्फ न गाने को अपराध बनाया जा सकता है। कोर्ट ने मौखिक तौर पर साफ किया कि जानबूझकर गायन में बाधा डालना और व्यक्तिगत रूप से न गाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।