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एक छोटी सी बात है। इतनी छोटी कि कहने में भी संकोच हो।
बात सिर्फ इतनी है कि हम दूसरों को उसी तराजू में तौलें, जिसमें खुद को तौलना चाहते हैं।
सुनने में कितनी आसान लगती है, है न? पर असल में सबसे मुश्किल यही है।
हम करते क्या हैं? दूसरे के लिए हम पहाड़ जैसी कसौटी गढ़ देते हैं। इतनी ऊँची कि वह उस पर चढ़ ही न पाए। क्योंकि अगर वह चढ़ गया, अगर वह खरा उतर गया, तो हमें उसे क्लीन चिट देनी पड़ेगी। और क्लीन चिट दे दी तो हम उसे अपने से नीचा कैसे दिखाएंगे?
डर तो यही है कि वह बराबरी पर न आ जाए। बल्कि सच तो यह है कि वह बराबर नहीं, हमसे बेहतर साबित हो जाएगा। इसलिए बेहतर यही है कि उसे कसौटी ही ऐसी दो जो वह कभी पूरी न कर पाए। फिर तो हमारे पास उसकी आलोचना का स्थायी लाइसेंस है।
असली संकट तब शुरू होता है जब यही तराजू घूमकर हमारी तरफ आ जाता है।
जब हमारी अपनी जिंदगी, हमारा अपना आचरण सार्वजनिक निगाह में आ जाता है, तब हमें समझ आता है कि जो कसौटियां हमने दूसरों के लिए बनाई थीं, उन पर चलना कितना कठिन है।
तो हम क्या करते हैं? हम चुपके से खुद को उन कसौटियों से छूट दे देते हैं।
और इस छूट को छुपाने के लिए हम अपने इर्द-गिर्द एक घेरा बना लेते हैं। कुछ ‘अपने’ लोगों का। उन्हें हम ‘विश्वस्त’ होने का तमगा देकर अपना राजदार बना लेते हैं। हमारी उनसे एक ही उम्मीद होती है – कि वे हमारी असलियत बाहर न जाने दें।
धीरे-धीरे यही ‘अपनेपन’ का घेरा हमारी जेल बन जाता है। हम पारदर्शिता, साहस, सच्चाई जैसे शब्दों से दूर होते जाते हैं। हम हमेशा डरे रहते हैं कि कहीं कोई हमारा भेद न खोल दे। और इसी डर में हम उन ‘अपनों’ को भी साधने लगते हैं। कभी एहसान के बोझ से, तो कभी उनकी कमजोरियों की फाइल बनाकर।
हमारा सारा वक्त, हमारी सारी बौद्धिक ऊर्जा इसी में खर्च होने लगती है कि जो हम कर रहे हैं उसे सही कैसे साबित किया जाए। सही करना पीछे छूट जाता है, सही दिखाना ही सब कुछ बन जाता है।
और तब, बाहर से देखने पर हम भले ही कितने ऊँचे, कितने सुरक्षित और सफल दिखें, अंदर से हम थक कर चूर हो चुके होते हैं। खुद से लड़ते-लड़ते।
जिंदगी जो एक सीधी लकीर हो सकती थी, वह हमारे ही हाथों से उलझी हुई गुत्थी बन जाती है।
शायद इसीलिए कहा गया है – छोटी-छोटी, सीधी-सादी बातें ही अमल में सबसे मुश्किल होती हैं।