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श्रीमती मुन्नी देवी दीक्षित प्रधान संपादक
2027 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा तथा मणिपुर में विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। विधानसभा चुनाव अपेक्षित है। भारत में लोकतंत्र की स्थिति नाजुक है। लोकतांत्रिक राजनीति में शक्ति का स्रोत राज्य के प्रशासनिक उपकरणों में न होकर जनता की सहानुभूति में होता है। राज्य के प्रशासनिक उपकरणों की शक्तियों के इस्तेमाल का साहस भी जनता की सहानुभूति से नहीं निकलता है।
भारतीय जनता पार्टी के शासन में अब सरकार की प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल के साहस का संबंध प्रशासनिक उपकरणों से सीमित हो कर रह गया है! सब से गहरा सवाल कि आखिर आस्था की राजनीति करनेवालों ने किस प्रकार से जनता की सहानुभूति खो दी है। जनता की सहानुभूति खोने के बाद सत्ताधारी दल की राजनीति खीझ से भरी हुई है।
इस खीझ के साथ ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ने के लिए मजबूर है जबकि इसी ध्रुवीकरण की राजनीति के चलते ही सत्ताधारी दल के प्रति लोगों की सहानुभूति शिथिल होती चली गई, और अब अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 का महत्व भारत की सत्ता संरचना के नजरिये से बहुत अर्थपूर्ण है। अब सत्ता के मचान के नीचे जबरदस्त हलचल मची हुई है। जैसे मचान के नीचे जनाक्रोश का बाघ है और मचान पर निहत्था सत्ता के शिकारी!
सत्ता के अंतःपुर में कल्याणकर कोहराम
राम से कोहराम का सफर! भला कोहराम से कल्याण कैसे? क्या है कल्याणकर कोहराम? परेशान करनेवालों के बीच कलह का कोहराम परेशान, लोगों के लिए कल्याणकर ही होता है। क्या भाजपा-आरएसएस का एक अंदरूनी हिस्सा भी योगी आदित्य नाथ की स्थिति में खोट पैदा करने में लगा हुआ है? जाहिर है कि इस का कोई सीधा-सरल जवाब नहीं हो सकता है। समझने की खास जरूरत है कि जिन सवालों का सीधा-सरल जवाब न हो, उन्हें गैर-जरूरी नहीं माना जा सकता है।
कांशीराम स्मृति उपवन में भाजपा को दोहरी राजनीति की गंध में कुछ-न-कुछ जरूर उपयोगी था। शुरू में इसे कारगिल युद्ध के शहीदों की स्मृति से जोड़ा गया था। मायावती सरकार ने इस में कांशीराम का नाम जोड़ दिया। कांशीराम दलित राजनीति की रणनीतिक जरूरत और महत्व को उभारनेवाले सब से बड़े नेता थे। कांशीराम बसपा के संस्थापक थे और जाहिर है कि उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरा थे। योगी आदित्य नाथ के शपथ समारोह के लिए इस स्थान के चुनाव का उद्देश्य साफ-साफ समझा जा सकता है।
बहन मायावती की बहुजन की राजनीति को थोड़ा पीछे करते हुए कांशीराम के सम्मान को आगे कर दलित वोट को सीधे साधने की कोशिश लंबे समय से कर रही थी। एक उद्देश्य ओबीसी के ठगे जाने से होनेवाली राजनीतिक क्षति को कम करना भी था। दूसरा उद्देश्य था ओबीसी की पराजित शक्ति को इस आश्वासन के साथ अपने हाथ में रखना कि ओबीसी के नेता के रूप में उनकी ताकत को चुनौती देनेवाले किसी व्यक्ति को फिलहाल भारतीय जनता पार्टी में उभरने नहीं दिया जायेगा।
यानी बहुजन समाज पार्टी की राजनीति को पीछे और ओबीसी की राजनीति का रणनीतिक साथ! बहन मायावती शपथग्रहण समारोह से दूर रही जबकि समाजवादी पार्टी सत्ता के साथ में संभावनाओं की गंध मिल रही थी!
योगी आदित्य नाथ के अलावा भाजपा-आरएसएस के मुख्यमंत्री पद के जो भी प्रत्याशी थे वे अलग से राम मंदिर का राग अलापने में सक्षम नहीं थे, कारण कि किसी के पास हिन्दू युवा वाहिनी नहीं थी! ध्यान रहे, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का वह अंतिम फैसला आना 2017 में बाकी था जो नवंबर 2019 को आया था।
यही कारण था कि ओबीसी के नेता केशव प्रसाद मौर्य के नेतृत्व में भाजपा ने 2017 में भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। वही मुख्यमंत्री के स्वाभाविक दावेदार थे, लेकिन ओबीसी नेता के नये रूप में केशव प्रसाद मौर्य के उभार से भाजपा की उच्च-वर्ण राजनीति को भीतर से चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी।
केशव प्रसाद मौर्य के उभार से ओबीसी के पारंपरिक नेताओं में भी बेचैनी कम नहीं थी। इसलिए कांशीराम स्मृति उपवन में योगी आदित्य नाथ के शपथ समारोह में मंच पर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव तो थे, लेकिन बहुजन समाज पार्टी ‘सुप्रीमो’ बहन मायावती नहीं थी।