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अपने अधिकार जानिए – विशेष संपादकीय*
प्रधान संपादक : श्रीमती मुन्नी देवी दीक्षित*
आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा। सवाल इससे कहीं बड़ा हो गया है – क्या हर नागरिक का वोट वास्तव में सुरक्षित है?
एसआईआर (Special Intensive Revision) को लेकर देश में उठ रहे सवाल इसी बुनियादी चिंता को सामने ला रहे हैं। क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान के दिन तय नहीं होती, यह इस बात से भी तय होती है कि किसका नाम मतदाता सूची में है और किसका नहीं।
विपक्षी दलों और सिविल सोसाइटी का आरोप है कि इस कवायद का राजनीतिक लाभ सुनियोजित तरीके से सत्ताधारी दल को पहुँचाया जा रहा है। इन आरोपों की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
*आंकड़ों पर उठ रहे सवाल -*
रिपोर्टों के मुताबिक एसआईआर के तहत 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट सूचियों में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने का दावा किया जा रहा है। दिल्ली में ही करीब 47 लाख नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लिकेट श्रेणी में डाले गए, करीब 11 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर रहने और लगभग 32 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी होने की बात सामने आ रही है। _अपने अधिकार जानिए इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता, यह विपक्ष द्वारा उठाए गए दावों पर आधारित है।_
अब नए खुलासे से मामला और गंभीर हो गया है। खबरों के अनुसार चुनाव आयोग के तीन में से दो आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार आयोग की कार्यप्रणाली पर आपत्ति दर्ज की है। जब संस्था के भीतर से ही सवाल उठ रहे हों तो जवाबदेही और स्वतंत्र जाँच की मांग और जरूरी हो जाती है।
संविधान हर नागरिक को बराबर अधिकार देता है, लेकिन जमीनी हकीकत में धन, बाहुबल और सत्ता के प्रभाव के सामने आम नागरिक के अधिकार हमेशा चुनौती में रहते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के हितों की रक्षा का दावा तो करती हैं, पर चुनावों में पूँजी और सत्ता के गठजोड़ से कौन अनजान है?
फिर भी जनता के हाथ में एक आखिरी औजार बचता था – उसका वोट। निरंकुशता की हद पार होने पर सत्ता बदलने का अधिकार।
लेकिन अगर वोटर लिस्ट ही मनमर्जी से बनने लगे, योग्य नागरिकों के नाम काटे जाने लगें और फर्जी वोटर जोड़े जाने लगें, तो यह सामान्य प्रशासनिक भूल नहीं है। यह जनता के सीमित लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा प्रहार है।
इसलिए माँग उठ रही है कि एसआईआर प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त समेत चुनाव आयोग की भूमिका की स्वतंत्र, उच्चस्तरीय जाँच हो। सरकार और आयोग के बीच मिलीभगत के आरोपों की भी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
पूँजीवादी व्यवस्था में लोकतंत्र पहले ही सीमित है, अगर वोट को भी सीमित कर दिया गया तो लोकतंत्र सिर्फ एक खोखला आवरण बनकर रह जाएगा।
*आज असली लड़ाई वोट देने की नहीं, वोट बचाने की है।*
लोकतंत्र तभी सार्थक होगा, जब सत्ता जनता की मालिक नहीं, बल्कि जनता की जवाबदेह सेवक बने।