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घर से निकला ही था कि दोस्त मिल गया कार में।
बोला — अरे, बैठो! नोएडा सिटी सेंटर ही जा रहा हूँ, छोड़ दूंगा।गाड़ी अच्छी थी। AC, खुशबू, मीठी बातें। पता ही नहीं चला रास्ता कब कटा।
सिटी सेंटर आया तो मैंने कहा — बस, यहीं रोक दो।
उतरा। वो आगे निकल गया। मैं धूप में खड़ा था।
और तभी दिमाग में करंट मारा —
दो मिनट पहले तक इसी धूप से बचने के लिए मैं इस गाड़ी का शुक्रगुज़ार था, अब इसी धूप में खड़े होकर उसी गाड़ी को जाते हुए देख रहा हूँ। अगर लालच करता, दो मिनट और बैठा रहता, तो AC तो मिलता रहता, पर मेरा मेट्रो स्टेशन छूट जाता। मंज़िल पीछे चली जाती।
समझ आया — इस दुनिया में कोई चीज़ अच्छी या बुरी नहीं होती, उसका टाइमिंग अच्छा या बुरा होता है।*
जो गाड़ी सिटी सेंटर से _पहले_ तक आपको मंज़िल तक पहुँचा रही है, वही गाड़ी सिटी सेंटर के _बाद_ आपको मंज़िल से दूर ले जा रही है।
अब इसी फार्मूले को देश पर लगाइए —
जो राष्ट्रवाद 1947 में आपको अंग्रेज़ से आज़ाद कराता है, वही राष्ट्रवाद 2026 में अगर आपको अपने ही पड़ोसी से दिन-रात नफरत करना सिखाए, तो समझो आप सिटी सेंटर क्रॉस कर चुके हैं। अब उतरना पड़ेगा।
जो धर्म आपको बचपन में दया, करुणा, परोपकार सिखाता है, वही धर्म अगर जवानी में आपको दूसरे धर्म के खून का प्यासा बना दे, तो गाड़ी गलत रूट पर है। कूद जाइए।
जो पैसा, जो पद, जो रिश्ता आपको कभी सुरक्षा देता था, वही अगर आज आपका दम घोंट रहा है — तो वो AC वाली गाड़ी अब जेल बन चुकी है।
समस्या गाड़ी में नहीं, हमारे उतरने के साहस में है।
हमें AC इतना प्यारा लगता है कि हम जानते हुए भी गलत रास्ते पर बैठे रहते हैं। क्योंकि धूप में उतरना पड़ता है। पैदल चलना पड़ता है।
और पैदल चलने की हिम्मत सबमें नहीं होती।
– रोहताश दीक्षित*अपने अधिकार जानिए*