1
1
विशेष संपादकीय – अपने अधिकार जानिए समाचार पत्र*
*तारीख: 18 अक्टूबर 2026, रविवार
रोहतास दीक्षित, उप-संपादक*
महाभारत में द्यूत क्रीड़ा केवल जुआ नहीं थी, वह सत्ता हड़पने की एक सोची-समझी योजना थी। शकुनि पांसे फेंकने में उस्ताद था, पर सवाल पांसे फेंकने का नहीं, पांसे पर नियंत्रण का था। दुर्योधन ने उसी नियंत्रण का इस्तेमाल किया।
कहानी सब जानते हैं। युधिष्ठिर को पता था कि खेल बराबरी का नहीं है। लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है। फिर भी वे चुनौती को ठुकरा नहीं सके। क्यों? क्योंकि शकुनि की बेईमानी का कोई ठोस सबूत नहीं था। बिना सबूत आरोप लगाना राजधर्म के खिलाफ होता। नतीजा – राज्य गया, वनवास मिला और भरे दरबार में द्रौपदी का अपमान हुआ।
कौरव जीत के बाद उसी जीत को ढाल बना लेते थे। हर सवाल का एक ही जवाब – “खेल में जीत कर दिखाओ।” जब जीत नहीं सकते तो सवाल का कोई मतलब नहीं। इस तर्क से पांडवों के हक का सवाल, एक स्त्री की गरिमा का सवाल, सब हवा में उड़ा दिया गया।
*पर कौरव एक बात भूल गए थे – जो मामा के पांसे से हारा है, वह युद्ध में छक्के छुड़ा सकता है। युद्ध में पांसे काम नहीं आते।*
*आज की महाभारत*
आज देश जिस महाभारत में फंसा है, वहाँ भी कई लोगों को लगता है कि चुनावी चौपड़ में पांसे ही बोल रहे हैं। नतीजा एक जैसा आ रहा है। एक पक्ष का आत्मविश्वास आसमान छू रहा है, दूसरा पक्ष टापता रह जाता है। शुभचिंतक कह रहे हैं – इस खेल से बाहर आ जाओ, तुम नहीं जीत पाओगे। पर दूसरे पक्ष का राजधर्म आड़े आ रहा है। लोकतंत्र में चुनाव से भागना भी तो धर्म नहीं है।
*तो क्या फैसला युद्ध से होगा?*
अगर युद्ध होना ही है तो गांधी के देश में वह युद्ध कैसा होगा? वह तलवारों का युद्ध नहीं होगा। वह होगा –
*1. प्रमाण का युद्ध:* शकुनि के पांसे में गड़बड़ी है तो उसे शक से नहीं, प्रमाण से साबित करना होगा। अदालत में, चुनाव आयोग के सामने, जनता की अदालत में।
*2. सत्याग्रह का युद्ध:* गांधी ने कहा था, अन्याय के खिलाफ लड़ाई दूसरे को हराने के लिए नहीं, खुद को सही साबित करने के लिए लड़ी जाती है।
*3. विकल्प का युद्ध:* पांडव अंत में पांसे में नहीं, अपने कर्म, संगठन और तप से जीते। आज भी जनता पांसे नहीं, विकल्प देखती है।
शकुनि के पांसे कुछ दिन चल सकते हैं, सदा नहीं। इतिहास गवाह है, चौपड़ पलटती जरूर है, पर तब जब खिलाड़ी पांसे को नहीं, खेलने वाले के मन को जीत ले।
*प्रधान संपादक: मुन्नी देवी दीक्षित, गोपी, अकराबाद, अलीगढ़ |