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शास्त्र, परंपरा और तमाशा: रावण दहन के पाखंड पर एक वैचारिक प्रहार*

उज्जैन के सुप्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर से जुड़े महेश पुजारी (महाकाल सेना के संरक्षक) ने समाज के सामने एक ऐसा ज्वलंत प्रश्न खड़ा किया है, जिसने हमारी सदियों पुरानी रूढ़ियों की बुनियाद हिला दी है।

महेश पुजारी ने समाज और उत्सव समितियों को कानूनी नोटिस भेजकर चुनौती दी है कि वे किसी भी हिंदू धर्मग्रंथ से ‘रावण दहन’ का धार्मिक प्रमाण प्रस्तुत करें।

यह केवल एक रस्म पर आपत्ति नहीं, बल्कि सनातन धर्म के नाम पर फैलाई जा रही अज्ञानता और शास्त्र-विरोधी आचरण पर तीखा प्रहार है।

*शास्त्र क्या कहते हैं?*

सनातन धर्म के आधार स्तंभ वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस में कहीं भी रावण का पुतला बनाकर जलाने का उल्लेख नहीं है। वहां केवल ‘रावण वध’ का वर्णन है – अधर्म के प्रतीक का युद्ध में अंत।

*मर्यादा पुरुषोत्तम का आदर्श*

स्वयं श्री राम ने कहा था – “मरणान्तानि वैराणि” अर्थात मृत्यु के साथ ही सारे वैर समाप्त हो जाते हैं। रावण वीरगति को प्राप्त हुआ था। हर साल उसका पुतला बनाकर जलाना राम के इसी आदर्श के विपरीत है।

आज का रावण दहन क्या बन गया है?*

आज यह धर्म से कटकर मनोरंजन, राजनीति और व्यापार बन चुका है। भव्य मेले, लाखों के पटाखे, VIP भाषण और हुड़दंग – क्या यही सनातन संस्कृति है? ये केवल प्रदूषण और धन का अपव्यय है।

इतिहास साक्षी है कि ये प्राचीन परंपरा नहीं, बाद में शुरू हुई एक लोक-परंपरा है। राजस्थान के कई गांवों, मध्य प्रदेश, और ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में आज भी पुतला नहीं जलाया जाता, केवल प्रतीकात्मक वध लीला होती है।

रावण अवगुणों के बावजूद परम शिवभक्त, वेदज्ञ और महापंडित था। उसका न्याय त्रेतायुग में ही हो चुका था। उसे युगों तक जलाना सनातन की उदारता और क्षमा के विरुद्ध है।

अगर बुराई मिटानी ही है तो बाहर के कागज के पुतले नहीं, अंदर के रावण को जलाना होगा – भ्रष्टाचार, अनाचार, महिलाओं के प्रति अपराध।

महेश पुजारी जी का यह कदम एक शंखनाद है। समय है कि इस अशास्त्रीय तमाशे को तिलांजलि देकर उत्सवों को ज्ञान, भक्ति और आंतरिक शुदता
के रूप में मनाया जाए।

अपने अधिकार जानिये समाचारपत्र 

लेखक 

मुन्नी देवी दीक्षित प्रधान संपादक, गोपी अकराबाद अलीगढ 

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