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दीप का दर्शन और सिंहासन का मोह*

सेवा का उत्सव या सत्ता का उत्सव?*

 रोहिताश दीक्षित उपसंपादक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन पर भाजपा और उसकी सरकारों में स्वाभाविक उत्साह है। 17 सितंबर को दीप प्रज्ज्वलन और 17 सितंबर से 17 अक्तूबर तक ‘सेवा संकल्प अभियान’ का निर्णय लिया गया है। इस अभियान में वाराणसी से बड़नगर और बड़नगर से वाराणसी तक युवा कार्यकर्ताओं की मोटरसाइकिल यात्रा भी शामिल है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बौद्धिक और इंडिया फाउंडेशन के अध्यक्ष राम माधव ने इस अवसर पर लिखा है कि मोदी का जीवन लक्ष्य है –

पथ का अंतिम लक्ष्य नहीं है, सिंहासन चढ़ते जाना_

_सब समाज को लिए साथ में, आगे है बढ़ते जाना_

वे लिखते हैं कि शासन की भारतीय अवधारणा सेवा भाव है और मोदी सरकार उसी पर चल रही है। महाभारत में भीष्म के राजधर्म की व्याख्या करते हुए वे उसके तीन तत्व बताते हैं – साहस, समवेदना और समदृष्टि।

राम माधव ने श्रेष्ठ राजनीतिक मूल्यों के सारे फूल बरसाते हुए मोदी को बधाई तो दी, पर वे भारतीय परंपरा के एक और महत्वपूर्ण मूल्य – *वानप्रस्थ* को भूल गए। हमारी परंपरा में राजा को एक अवस्था के बाद योग्य उत्तराधिकारी को राजपाट सौंपकर वन प्रस्थान का निर्देश है।

क्या सेवा के लिए सिंहासन जरूरी है?*

सवाल है कि क्या समाज की सेवा तभी शुरू होती है जब आप मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनते हैं? इस देश में अनगिनत साधु, संत, फकीर हुए हैं जो कभी सत्ता में नहीं रहे, सत्ता से दूर रहे, फिर भी उन्होंने समाज की भरपूर सेवा की।

जिस महाभारत से राजधर्म का उपदेश लिया जा रहा है, उसके रचयिता वेदव्यास राजमहल से दूर वनों में रहते थे, जबकि उनके वंशज महलों में थे। वाल्मीकि भी कभी राजमहल में नहीं रहे, पर उन्होंने अपने शिष्य लव-कुश के माध्यम से राजसत्ता के अन्याय को चुनौती दी।

जिन कौटिल्य का बार-बार उल्लेख संघ के विद्वान करते हैं, वे क्या राजमहल में रहते थे? कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट लिखा है कि राजा के निजी कार्य और शासकीय कार्य में फर्क होता है और शासकीय मदों को निजी कार्य में खर्च नहीं करना चाहिए। वे स्वयं इसका उदाहरण थे।

जिन तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ को उद्धृत किया जाता है, वे किस महल में रहे? उन्होंने राम के आदर्श को रखा तो आजीविका के लिए भिक्षाटन की वृत्ति अपनाई।

बुद्ध, महावीर कौन सी सत्ता पर बैठकर सेवा करते थे? उन्होंने तो राजपाट छोड़कर वनों में अपने भीतर दीप जलाए और दुखों से मुक्ति की राह बताई। झोपड़ी में रहकर स्वाधीनता संग्राम चलाने वाले गांधी भी उसी राह के राही थे। गांधी के पथ का लक्ष्य सिंहासन चढ़ते जाना नहीं, बल्कि सिंहासन से दूर जाना और समाज में सिंहासन की जरूरत को ही खत्म करना था।

मंत्रिमंडल और संस्थाओं का क्या?*

भारतीय परंपरा में राजा मंत्रिमंडल के सुझावों से बंधा होता था। क्या प्रधानमंत्री मोदी ने एक भी ऐसा दृष्टांत दिया है जहां उन्होंने अपनी जिद के आगे मंत्रिमंडल की सलाह मानी हो? वे तो तब भी नहीं माने जब स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने राजधर्म की सलाह दी थी। नोटबंदी, लॉकडाउन जैसे फैसले मंत्रिमंडल और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दरकिनार कर लिए गए।

दीप का असली अर्थ*

दीप जलाना अच्छी बात है, पर बुद्ध ने दीप को ज्ञान का प्रतीक बताया है – ‘अप्प दीपो भव’। यानी आप अपने दीपक स्वयं बनो।

संघ-परिवार की सोच में ‘आप अपने दीपक स्वयं बनो’ की संभावना कहां है? वहां सोचने का काम हम पर छोड़ दो, हम जैसे समाज को परिभाषित करें उसे मान लो, वाली सोच है। धर्म, विज्ञान, राजनीति, संस्कृति को परिभाषित करने का ठेका पहले से ले रखा है।

जब ज्ञान की कोई नई धारा, संघ की सोच से भिन्न धारा पनपने की कोशिश करती है, तो उसे दबाने की कोशिश होती है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS) जैसे संस्थान को बंद करने की तैयारी इसका उदाहरण है, जिसने रजनी कोठारी, आशीष नंदी, योगेंद्र यादव जैसे समाजशास्त्री दिए।

सरकार को आत्मा को दीप्त करने वाला दीपक नहीं, चेतना को सुला देने वाला दीपक चाहिए जो उजाले से अधिक अंधेरा पैदा करे। तभी तो दुष्यंत कुमार याद आते हैं –

कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए_

_कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए_

अयोध्या में चिराग जलाकर गिनीज बुक में रिकॉर्ड तोड़ने के बाद जब लोग दिए से तेल निकालकर खाना पकाने ले जाते हैं, तो पता चलता है कि ये चिराग किसके घर के लिए हैं।

गोपाल दास नीरज ने लिखा था –

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना_

_अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए_

नीरज की यह चेतावनी सिर्फ एक शासक के लिए नहीं, दुनिया के हर शासक वर्ग के लिए है, जो सत्ता कायम रखने के लिए एक ही खेल खेल रहा है।

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