1
1
1
2
3
नई दिल्ली, 29 अक्टूबर 2026 (अपने अधिकार जानिए दैनिक)*
शास्त्रों में कहा गया है – *”मेघाच्छन्ने न दृश्येत चन्द्रमा:”* – यदि बादलों से चंद्रमा न दिखे तो क्या करना? इसका समाधान *धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और व्रतराज* में स्पष्ट दिया गया है।
ब्राह्मण समाज के वरिष्ठ आचार्यों के अनुसार इसके तीन प्रमाणित उपाय हैं:
*1. काल-गणना से चंद्रोदय मानना (शास्त्र का मुख्य सिद्धांत)*
*धर्मसिंधु* और *निर्णयसिंधु* में स्पष्ट है – चतुर्थी तिथि में चंद्रमा का उदय निश्चित काल पर होता ही है, भले ही वह आंखों से न दिखे। जैसे सूर्य ग्रहण के दिन बादल हों तो भी सूर्य है, वैसे ही चंद्रमा है।
– *उपाय:* पंचांग में दिए गए अपने शहर के *चंद्रोदय समय* (दिल्ली आज 8:17 PM) के बाद 10-15 मिनट प्रतीक्षा करें।
– फिर पूर्व दिशा की ओर मुख करके *”क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिगोत्रसमुद्भव, गृहाणार्घ्यं मया दत्तं इंदो रूप निशापते”* मंत्र से जल में दूध, अक्षत, सफेद फूल मिलाकर अर्घ्य दें।
यह उपाय *मानसिक दर्शन* कहलाता है और शास्त्र-सम्मत है।
*2. शिव को चंद्रमा मानकर अर्घ्य (ब्राह्मण परंपरा)*
व्रतराज और शिव पुराण में बताया गया है – *चंद्रमा शिव के मस्तक पर है, इसलिए शिव ही चंद्रमा हैं।*
– ब्राह्मण आचार्य बताते हैं – यदि चंद्रमा न दिखे तो भगवान शिव की मूर्ति या शिवलिंग के सामने करवे से अर्घ्य दें।
– मंत्र: *”सोमाय नमः, निशाकराय नमः”*
– इसके बाद पति के हाथ से जल ग्रहण करें। व्रत भंग नहीं होगा, बल्कि पूर्ण फल मिलेगा।
*3. प्रतीक चंद्रमा की पूजा (प्रतिनिधि पूजा)*
यह सबसे प्राचीन ब्राह्मण परंपरा है जो गांवों में आज भी होती है:
एक साफ थाली में चंदन या आटे से छोटा चंद्रमा बनाएं
– उस पर थोड़ा घी का दीया जलाएं
– छलनी से उसी प्रतीक चंद्रमा को देखकर फिर पति का चेहरा देखें
– यह *प्रतिनिधि-पूजा* कहलाती है और वेदों में भी “अभावे प्रतिनिधिः कार्यः” कहा गया है – अभाव में प्रतिनिधि से काम चलता है।
*क्या नहीं करना?*
ब्राह्मणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है:
– किसी की बताई झूठी लाइट को चांद मानकर अर्घ्य न दें – *वीरवती की कथा* में इसी झूठे चांद से व्रत टूटा था।
– पड़ोस में कहीं लाइट जल रही है तो उसे चांद न समझें।
अपना शहर का चंद्रोदय समय पंचांग से ही देखें।
*सार:*
*जहां चांद नहीं दिख रहा, वहां पंचांग के समय को ही उदय मानकर, शिव को साक्षी मानकर, पूर्व दिशा में अर्घ्य देकर व्रत खोलना ही शास्त्र-सम्मत है।* इससे व्रत का पुण्य पूरा मिलता है।
*संकलन:* प्रधान संपादक मुन्नी देवी दीक्षित
*शास्त्रीय सहयोग:* अलीगढ़ ब्राह्मण सभा के आचार्य पं. रामनिवास शास्त्री