Popular Posts

रात 12 बजे भी नहीं बुझती मणिकर्णिका की आग – जहाँ हर लाश मोक्ष पाती है”

लेखक – रोहिताश उर्फ अजय दीक्षित, उप-संपादक, बिछोरागंग, अलीगंज, एटा*

चाँदनी रात, गंगा किनारे धधकती हुई चिताएं, एक तरफ डोम राजा लकड़ी लगा रहा है, दूसरी तरफ गंगा में नावों पर लोग इस महाश्मशान के दर्शन कर रहे हैं। पीछे काशी के प्राचीन मंदिर, जहाँ 3000 साल से एक पल के लिए भी आग ठंडी नहीं पड़ी।

“जिस जगह जाने से इंसान जीवन भर डरता है, उसी जगह पर बैठकर जब मैंने एक चाय की चुस्की ली… तो समझ आया कि इस दुनिया में मौत से बड़ा कोई सच नहीं है और ज़िंदगी से बड़ा कोई झूठ नहीं!”* 🪔🔥🪵

पिछले हफ्ते जब मैं बनारस (वाराणसी) में था, तो मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। लोग अस्सी घाट पर संगीत सुनने जाते हैं, दशाश्वमेध पर भव्य आरती देखने जाते हैं, लेकिन मेरी आँखें उस जगह को देखना चाहती थीं जिसे दुनिया ‘महाश्मशान’ कहती है – *मणिकर्णिका घाट।*

रात के करीब 11 बज रहे थे। गंगा की लहरें शांत थीं, लेकिन मणिकर्णिका की तरफ बढ़ते ही हवा में जलती हुई लकड़ियों, घी और धूप की खुशबू के साथ एक भारीपन घुलने लगा था। सामने जो दृश्य था, उसने मेरे कदम वहीं रोक दिए।

*1. जहाँ 3000 सालों से चिता की आग कभी नहीं बुझी*

वहाँ पहुँचकर मुझे स्थानीय बुजुर्गों और नाविकों ने बताया कि मणिकर्णिका की यह आग सतयुग से जल रही है। भारत में चाहे कितने साम्राज्य आए और मिट गए, मुगलों के आक्रमण हुए, अंग्रेजों का राज आया, लेकिन मणिकर्णिका पर कभी ऐसा एक भी पल नहीं आया जब कोई चिता ठंडी पड़ी हो।

एक चिता की राख ठंडी भी नहीं हो पाती कि पीछे चार और शव कतार में ‘राम नाम सत्य है’ के उद्घोष के साथ अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे होते हैं। वहाँ अमीर का शव हो या गरीब का, अरबपति का हो या फकीर का… सब एक ही तरह की सूखी लकड़ियों के ढेर पर सोए हुए थे। उस आग के सामने किसी का बैंक बैलेंस काम नहीं आ रहा था!

*2. उस डोम राजा के शब्द, जो दिल में चुभ गए*

मैं घाट की एक सीढ़ी पर चुपचाप बैठकर जलती हुई लपटों को देख रहा था। मेरे बगल में चिता को अग्नि देने वाले डोम समाज के एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति बैठे थे।

मैंने उनसे धीरे से पूछा – “चाचा, दिन-रात यहाँ लाशें जलती देखकर क्या कभी डर या रोना नहीं आता?”

उन्होंने मुस्कुराते हुए जो बात कही, वह मेरे कान में आज भी गूंजती है –

“भैया, डर तो बाहर की झूठी दुनिया में लगता है जहाँ अपने ही अपनों का गला काटते हैं। यहाँ तो सब राख बनकर शांत हो जाते हैं। जब कोई देह जलती है, तो हम लाश नहीं देखते… हम देखते हैं कि एक आत्मा को महादेव ने अपने चरणों में मुक्ति दे दी!”*

*3. मणिकर्णिका नाम क्यों पड़ा? (वह पावन रहस्य)*

वहाँ एक बहुत प्राचीन कुंड है – ‘चक्रपुष्करिणी कुंड’। मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु ने यहाँ हजारों वर्ष तपस्या की थी। उनके तप से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव यहाँ आए, तो आनंद में झूमते हुए माता सती के कान की बाली (मणिकर्णिका) उस कुंड में गिर गई थी।

तब महादेव ने इस भूमि को यह वरदान दिया था कि – “यहाँ मरने वाले किसी भी प्राणी को पुनर्जन्म के चक्र में नहीं भटकना पड़ेगा। अंतिम समय में स्वयं शिव उसके कान में ‘तारक मंत्र’ फूँककर उसे मोक्ष प्रदान करेंगे।”

यही कारण है कि यहाँ मृत्यु शोक नहीं, बल्कि एक मुक्ति का उत्सव है!

*4. 2 घंटे बाद जब मैं वहाँ से उठा…*

रात के 1 बज चुके थे। चिताओं की लाल लपटें गंगा के काले पानी पर तैर रही थीं। पास की चाय की टपरी से मैंने कुल्हड़ की चाय ली।

उस दिन मुझे समझ आया कि हम जीवन भर किस बात का घमंड करते हैं?

वह सुंदर चेहरा,वह महंगी गाड़ियाँ,

वह मकान और ज़मीन-जायदाद…

अंत में केवल 4 से 5 मन लकड़ी, थोड़ा सा कफ़न और बस राख का एक ढेर ही तो बाकी रहता है! मणिकर्णिका इंसान के सारे अहंकार को 2 घंटे में जलाकर भस्म कर देता है।

*संदेश -* यदि जीवन में कभी बहुत ज्यादा तनाव हो, किसी बात का बहुत घमंड आ जाए, या अपनों से मनमुटाव हो जाए… तो एक बार बनारस जाकर मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर एक रात बिता लेना। जीने का नज़रिया न बदल जाए तो कहना!

 

*🕉️ हर हर महादेव!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *